–ग़ज़ल–

आज जिन्दगी अपनी उलझनों मे कटती है
रात भर ये तनहाई सॉप बनके डसती है
कौन सुनने वाला है गम की दास्तॉ अपनी
आजकल जमाने में आप ही कि चलती है
कोई तो बता दे ये है कहॉ मेरा हमदम
बार बार मिलने की आरजू मचलती है
मैं तो उस पे हर लम्हा जॉनिसार करता था
फिर वो बेवफा ऐसी रास्ता बदलती है
दफ्न करके जब मैयत मेरी जा चुके घायल
तब वो कब्र पे मेरी आके हाथ मलती है

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