– ग़ज़ल –

दुश्मनी में बक्त जाया बेवजह किया
मुखबिरी अपनों ने की शक बेवजह किया

शाखों की साजिशों से जमींदोज था दरख़्त
हमने तो आँधियों को दोष बेवजह दिया

सर्द रातों में सुलाया जिसने आँचल में हमें
उससे कहते हो की कम्बल बेवजह लिया

तुझसे मिलने पर हमें मालूम ये हुआ
हमने अब तक जिन्दगी को बेवजह जिया

जिन्दगी का सच सियासतदान के जैसा रहा
हमने तो उस पर भरोसा बेवजह किया

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