कविता
देखते देखते लगल कि आपन गांव षहर क बाप हो गइल
मंगरु कहलै हम ना जनली इ कुल अपनें आप हो गइल
अइसन हवा चलल पच्छूं से बदल गइल कुल चाल
ब्यूटी पार्लर खुलल जहां लइकी कटवावें बाल
बाप करें मजदूरी बेटवा घूमे रोज बजार
माइ के ना मिले दवाइ मेहरी पिये अनार
बाप के गोड़ ना लागे बेटा ई कइसन अभिषाप हो गइल
मंगरु कहलै हम ना…..
एक कोखी क जनमल भाई करेल मारा-मारी
अगनां में डड़वार डरावे झंखैं बाप मतारी
एक लोटा पानी मंगले दूनो जालैं झपिलाई
राम कृश्ण औ सरवन क कुल कथा गइल बिसराई
घर के अन्दर के रिष्ता फुटही ढोलक पर थाप हो गइल
मंगरु कहलै हम ना…..
गुल्ली डंडा, चिकई, हाकी, ओल्हा पाती खेल
गिरगिट जइसन किरकिट आके कइदिहलै कुल फेल
कजरी, फगुआ चइता नकटा खेमटा गइल हेराई
भोरहरिया में भजन के संग जंतसार न कहीं सुनाई
माटी के एइ गीतन पर अब सबी लालीपप हो गइल
मंगरु कहलै हम ना…..
बढ़ल बेमारी मोबाइल क सबके कइलस पस्त
रधिया, बुधिया, सगिया, सुनरी पाके भइलैं मस्त
घास करत क रहरी में बतिआवेले सुरसतिया
चउबिस घंटा कान सटवले घूमेला रमपतिया
पढ़े वाले लइकन के मुंह से हाय हेल्लो क जाप हो गइल
मंगरु कहलै हम ना…..
बाबू जी अब डेड हो गइलैं माई भइलीं मम्मा
डब्लू बब्लू टी0बी0 आगे नाचे झम्मक झम्मा
इ कुल हाल देख के लागे गांव रसातल जाई
सभे बतावा, तब कइसन इतिहास पढ़ावल जाई
बालेदीन ओह दिन सब सोची जानबूझ के पाप हो गइल
मंगरु कहलै हम ना…..
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