– औरत –

न होती दह्र में औरत जो तारीकी नज़र आती
चिराग़्रे ज़िन्दगी की रौशनी फीकी नज़र आती

वबाले दोश होती ज़िन्दगी इन्सान ज़ादों पर
घटाएं छाई होतीं यास की रंगीं इरादों पर

मसर्रत के हसीं लम्हात भी मफ़क़ूद हो जाते
इलाजे सोज़िशे दर्दे जिगर बेसूद हो जाते

अलम की बारिशों से आतिशे दिल सर्द हो जाती
तमन्नाए दिली सीने में अज़ ख़ुद दर्द हो जाती

छलक जाता ज़रा सी देर में पैमानए हस्ती
मोकम्मल ही न होता हश्र तक अफ़सानए हस्ती

रमूज़े हुस्न फि़तरत ता अबद रह जाते सर बस्ता
भटकते दह्र में इन्सान पाते ही नहीं रस्ता

मज़ाक़े ज़िन्दगी इस ज़िन्दगी पर मुनफइल होता
नज़र के ताज़ियानों से न पैदा दर्दे दिल होता

न होती मयकशी होते नहीं तामीर मयखाने
सुने जाते न हुस्नो इश्क़ के रंगीन अफ़साने

मोकइयद दिल में होता ही नहीं जज़बात का आलम
कभी होता नहीं बेदार एहसासात का आलम

बहिश्ते गोश होता यूँ न ज़िकरे गेसुओ साना
जवानी की निगाहों में न होता कोई अफ़साना

तममन्ना आंसुओं से तिश्नगी अपनी बुझा लेती
जवानी तंग बे कैफ़ी से आकर ज़ह्र खा लेती

चढ़ा होता ख़ेज़ा का रंग मतवाली बहारों पर
ग़मो आलाम होते हुकमरां दिलकश नज़ारों पर

न ज़ुल्फे नव ओरुसे ज़िन्दगी पुरपेचो ख़म होती
न होती ज़िन्दगी की हिर्स होती भी तो कम होती

हर एक सुबहे मोसर्रत ख़ेज़ शामे रन्जो ग़म होती
ये दुनिया अहले दुनिया पर ज़रीफ़ाना सितम होती

रबाबे ज़ीस्त पे नग़मे कभी गाये नहीं जाते
रमूज़ो फ़लसफ़ा तहरीर में लाए नहीं जाते

न होती इम्तज़ाजे रंगो बू खामा फ़रसाई
तहइयुर मेंन होते हुस्ने फ़ितरत के तमाशाई

निज़ामे बज्मे इम्कां में किसी शै की कमी होती
जबीने इरतेक़ा पे जहल की काई जमी होती

कभी जुम्बिश में आता ही नहीं गहवारए हस्ती
बशक्ले मुन्जमिद होता अबद तक पारए हस्ती

न तय इन्सां से इतनी इरतेक़ाई मन्जि़लें होतीं
न यूँ आरास्ता इल्मो हुनर की महफ़िलें होतीं

बहारों के मनाज़िर भी सोकूँ दुश्मन नज़र आते
जहन्नुम की भड़कती आग में खिरमन नज़र आते

–––