ग़ज़ल

प्यार पलता नहीं आतंक के घरानों में
फूल खिलता नहीं बारूद के बगानों में

मिट ही जाते हैं वही लोग राहजन बनकर
खुद जो रखते हैं दवा मौत की दुकानों में

जिन्दगी जिन से दुखी होके जुल्म सहती है
धर्म की आड़ में मिलते हैं वो ठिकानों में

जो भी मुफलिस का यहाँ अम्न चैन छीनेगा
जी कहाँ पाएगा अपने ही वो मकानों में

हो गये वक्त से पहले वो आज ही बूढ़े
जो ग़रीबी में गये कल ही कारखानों में

फिर बुलाती है मधुर देख देश की सरहद
है कहाँ कोइ तेरे जैसा नव जवानों में

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