– ग़ज़ल –

फ़रेब खाए हैं इतने कि कुछ शुमार नहीं
हमें अब अपने ही साये पे एतबार नहीं

दिखावा प्यार का करते हैं सब जहाँ वाले
किसी के दिल में किसी के लिये भी प्यार नहीं

किसी के हिस्से में गुल है किसी के हिस्से में खार
बहार कहने को कहिये मगर बहार नहीं

किसी के ग़म पे किसी को खुशी का हक़ हासिल
किसी को ग़म भी मनाने का अख्तियार नहीं

हमें न समझो हमें देख कर न पहचानो
हमारे चेहरे पे इतना अभी गुबार नहीं

सुकनो–अम्नो–अमां ढूँढने कहाँ जायें
जिधर भी देखिये हालात साज़गार नहीं

शरीके ग़म वही अपना हुआ है ऐ सालिक
कि जिसके दिल में हमारी तरह क़रार नहीं

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