बहुत दिनों के बाद

अपने आँगन ने पुचकारा बहुत दिनों के बाद।

घर का जोगी सिद्ध बनाया बहुत दिनों के बाद।।

इतना भार प्यार का, लघु मन पर कैसे झेलूँ।

पहरेदार निगाहों से बचकर कैसे खेलूँ।।

अवसर खुला दिया है अबकी बहुत दिनों के बाद।

घर का जोगी सिद्ध बनाया बहुत दिनों के बाद।।

इतना सब कुछ दिया आपने बिन झोली फैलाये।

यह भटका यायावर उसको कैसे धरे उठाए।

प्यासे मन की भरी गगरिया बहुत दिनों के बाद।

घर का जोगी सिद्ध बनाया बहुत दिनों के बाद।।

इनके उनके सबके दिल के द्वार खुले ऐसे।

पूरब-पश्चिम, उत्तर-दक्खिन एक हुए जैसे।।

पुरवैया का लगा झकोरा बहुत दिनों के बाद।

थपकी देकर पास सुलाया बहुत दिनों के बाद।।

माँ जैसा आँचल फैलाया बहुत दिनों के बाद।

घर का जोगी सिद्ध बनाया बहुत दिनों के बाद।।

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