महुए की गंध
फिर महकी धरती में महुए की गंध।
समा गये बांहों में शरमीले छंद।।
चमक-चमक जाती है ऋण-धन की चचंलता।
बलखाती अल्हड़ता सावन सी श्यामलता।।
परस-परस जाते हैं गीले मन को नयन।
दूर खड़े हंसते रह जाते सब बंधन।।
हो गए मिठास भरे सारे छल छंद।
समा गये बांहों में शरमीले छंद।।
झन्नाहट अंग-अंग छू गई सितार।
सिहरन में गुणा भाग जैसा विस्तार।।
कोष्ठक सब टूट गये सरल हुई भिन्ना।
साधारण समीकरण हो गया अभिन्ना।।
मौन मधुर स्वीकृति अब मन का अनुबंध।
समा गये बांहों में शरमीले छंद।।
बोल-बोल झरी एक दूधिया फुहार।
तन मन में व्याप गई मीठी झंकार।।
रोम-रोम रंग हुआ साँस हुई तान।
आंखों ही आंखों में फूटी मुस्कान।।
अंतरतर सरस भाव उठे मंद मंद।
समा गये बांहों में शरमीले छंद।।
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