एक मेह्रबान खातून के ख़त के जवाब में
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मुझसे मिलने की ख़ुदा के लिये ज़हमत न करो
ख़त भी लिखने की मेरे पास यूँ जुरअत न करो
मेरी गुस्ताखि़ए तहरीर पे हैरत न करो
मेरी कोताहिए दामां की शिकायत न करो
कौन कहता है कि तुम मुझसे मोहब्बत न करो
तुमको मालूम नहीं किस क़दर मजबूर हूँ मैं
ऐशो आराम की दुनिया से बहुत दूर हूँ मैं
अपने ही दिल में एक रिस्ता हुआ नासूर हूँ मैं
तुम मेरे वास्ते सामाने जराहत न करो
कौन कहता है कि तुम मुझसे मोहब्बत न करो
मैं ज़माना की निगाहों में एक आवारा हूँ
ज़िल्लत आमेज़ निगाहों का मैं गहवारा हूँ
मैं समझता हूँ तुम्हारे लिये नाकारा हूँ
रेत ही रेत से तामीर एमारत न करो
कौन कहता है कि तुम मुझसे मोहब्बत न करो
मेरी ख्वाहिश है कि नग़मा मेरा बेसाज़ रहे
ज़िन्दगी का मेरी जो राज़ है वो राज़ रहे
मुझको क्या चाहे कोई गोशबर आवाज़ रहे
ये एनायत है जो तुम मुझपे एनायत न करो
कौन कहता है कि तुम मुझसे मोहब्बत न करो
मेरी तख़ईल की ज़द में भी है जन्नत लेकिन
मेरी नज़रों में भी है हुस्न की अज़मत लेकिन
मेरे दिल में भी है एहसासे मोहब्बत लेकिन
मैं कहूँगा कि ज़माना से अदावत न करो
कौन कहता है कि तुम मुझसे मोहब्बत न करो
तुम कि परवरदहे अल्ताफ़ो करम हो जौहर
तुम कि परदाख्तए नाज़ो नअम हो जौहर
तुम कि बेगानए अन्दोहो अलम हो जौहर
ग़म व अन्दोह से तब्दील मुसर्रत न करो
कौन कहता है कि तुम मुझसे मोहब्बत न करो
क्यों न कह दूँ कि नहीं तुमसे मोहब्बत मुझको
क्यों न कह दूँ कि नहीं मिलने की फुर्सत मुझको
क्यों न ये साफ़ ही कह दूँ कि है नफ़रत मुझको
तुम जो कोताहिये दामां की शिकायत न करो
कौन कहता है कि तुम मुझसे मोहब्बत न करो
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