– ग़ज़ल –
मैं किस मन्जि़ल पे पहुँचा हूँ खुदारा देखते जाओ
सहारा पा के भी हूँ बे सहारा देखते जाओ
हुए तुम किस लिये बरहम खुदारा ये तो बतलाओ
हमें ये बरहमी भी है गवारा देखते जाओ
मुबारक हो तुम्हें जश्ने बहाराँ ऐ चमन वालो
मगर अब जल रहा है घर हमारा देखते जाओ
मोहब्बत को मोहब्बत की नज़र से लूटने वालो
किया किस हाल में हमने गुज़ारा देखते जाओ
कोई देखे न देखे हाले सफ़वी ग़म नहीं लेकिन
तड़पता है तुम्हारे ग़म का मारा देखते जाओ
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(शायर– सफ़वी बाराबंकवी 1959)