मौसम की मार

चैड़ा-चैड़ा पाट नदी का गहरी-गहरी धार।

सब उजड़े-उजड़े रूखे हैं, बे मौसम की मार।।

गुमसुम-गुमसुम से पत्थर हैं घाट किनारे के।

बहुत दिनों से नहीं पछीटे कपड़े लादी के ।।

सियोराम की नहीं सुनाई देती कहीं पुकार।

दूर-दूर तक तट सूने हैं, बे मौसम की मार।।

नहीं बालते मेंढक, मछली नहीं उछलती है।

सूरज की किरणें अब जल में जाल न बुनतीं हैं।

बगुलों और टिटहरी के दल कबके हुए फरार।

भुख गई ले उड़ा यहाँ से, बे मौसम की मार।।

सीपी, शंख, रेत से खाली नदिया की झोली।

विधवा जैसी माँग, नहीं सिंदूर, नहीं रोली।।

ये नि भी कैसे आए हैं, क्रूर काल की मार।

सब उजड़े-उजड़े रूखे हैं, बे मौसम की मार।।

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