– ग़ज़ल –
रिश्ते भी अब तो हमको निभाने नहीं आते
त्योहार भी तो हमको मनाने नहीं आते
ये कैसी शोहरतो का नशा हम पे चढ़ा है
जिनकी बजह से हम है वो हमको नहीं भाते
जो दिल में हमारे है वही तो जुबाँ पे है
हमको तो बहाने भी बनाने नहीं आते
मैखानों में कुछ लोग शौक से ही आ गए
सब लोग यहाँ गम को भुलाने नहीं आते
सब अपनी अपनी कीमतें हैं तय किये हुए
बस आप सही भाव लगाने नहीं आते
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