रेत बंधे पानी हैं

जीवन रस क्या बचता, रेत बंधे पानी हैं।

लहरें हैं न हलचल है, कोई न रवानी है।

जीवन रस क्या बचता, रेत बंधे पानी हैं।।

भीगना न सूखना

खोखली हंसी हंसना।

कदम कदम बालू के

दल-दल गहरे धंसना।

कागजी सलाखों में बंद हम कहानी हैं

जीवन रस क्या बचता, रेत बंधे पानी हैं।।

थोड़े से भीगे तो,

सीपी शंख उग आये।

बगुलों की आँखों में,

चमक बन उभर आये।।

कुछ दिन बरसात फिर तपन की निशानी हैं।

जीवन रस क्या बचता, रेत बंधे पानी हैं।।

आदमी नहीं हैं तो,

पत्थर ही ढूंढ़ लिए।

मन को समझाने के,

यत्न बहुत खोज लिए।।

पुरखों को पंद्रह दिन, शेष गुमनामी हैं।।

जीवन रस क्या बचता, रेत बंधे पानी हैं।।

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