–– ग़ज़ल ––
साथ में जी लूँ या जीते जी मर जाऊँ
अपना सब कुछ तुझको अर्पण कर जाऊँ
तेरी ख़ातिर छोड़ दिया घर बार अपना
बोल मैं क्या मुँह लेकर अपने घर जाऊँ
दुनिया की सारी दौलत इक ओर करूँ
तेरा साथ अगर पाऊँ तो तर जाऊँ
दिल का कोना खाली खाली लगता है
मिल जाये जो साथ तिरा तो भर जाऊँ
मेरा बस इक ख़्वाब है ‘मोहित’ जीवन में
कुछ नेकी के काम जहाँ में कर जाऊँ
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