– गजल

सारी शर्तें हुईं कुबूल
दरक रहे हैं मगर उसूल

वो गुलशन में रहे मगर
ऐसे जैसे कोई बबूल

सूद कीं बातें हैं बेमानी
अब खतरे में दिखता मूल

जो तुमने अहसान किये हैं
हम जाएंगे कैसे भूल

खोला उसने ऐसा मोर्चा
रखी हिलाकर सबकी चूल
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