गीत

हमने कहाँ से आग लगाना सीख लिया
बेबस पर ही दाग लगाना सीख लिया
हमने कहाँ से आग —–

मन्दिर मस्जिद औ गुरुद्वारे, बनते हैं नित साँझ सकारे
दौलत की खातिर ही हमने, कितनों के घर द्वार उजाड़े
लाचारों में भाग लगाना सीख लिया
हमने कहाँ से आग —–

गीता और कुरान भुलाकर, क्यों पावन ईमान भुलाकर
अम्न चैन को ठोकर दे कर, स्वारथ की दूकान लगाकर
पहरे पर क्यों नाग लगाना सीख लिया
हमने कहाँ से आग —–

गैरों को ही गले लगा कर, अपने रस्म रिवाज गँवा कर
सुखमय अरमानों की खातिर, सबको सूली ताक चढ़ा कर
अजब रुधिर का फाग लगाना सीख लिया
हमने कहाँ से आग —–

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