(हर शाम को दिये संग जलते हुए देखा है)

हर शाम को
दिये संग जलते हुए देखा है
इस उम्र को वक्त संग ढ़लते हुए देखा है
क्यों ? रात की खामोशियों में दिल उदास हो गया
पीछे कभी हैं देखते, पाया है क्या,क्या खो गया
किसकी तलाश में ताउम्र घूमते रहे
समझा नहीं कभी हम फिर भी ढूँढते रहे
और भी,
गहरा गया है यह अंधेरा
दिल के पंक्षी को
न जाने चाहिए कैसा बसेरा
रात के इस धुंधलके को एक किरण मिल जाये तो
हर मन की रेतीली जमीं पर एक कली खिल जाये तो
हर शाम जलना छोड़ दे
यह वक्त ढ़लना छोड़ दे
रात की खामोशियों में
दिल पिघलना छोड़ दे
बर्सात ऐसी आये
जिसमें हर गिले धुल जायें
प्रेम की गंगा से
दिल के द्वार भी खुल जायें
राह मत रोको
इस सरिता को अब बहने दो बस
मनुष्यता फिर सांस ले
ऐसी हवा चलने दो अब।

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