– नज़्म : मजलिसे अक़वाम –
है उन्हीं मुल्कों का क़ब्ज़ा मजलिसे अक़वाम पर
जिनके हाथों में हैं मोहलिक असलहे और मालो-ज़र
और मेम्बर तो फ़क़त हैं इस इदारे के गुलाम
जक़्स करते हैं इशारे पर उन्हीं के सुब्हो शाम
कौन कहता है ये अम्नो-आश्ती का बाग़ है
अस्ल में ये दामने-इनसानियत पर दाग़ है
ज़ुल्म की ताईद है इसका ओसूले जिन्दगी
है मसावातो-अखूवत इसके आगे दिल्लगी
हो रहे हैं नातवाँ शहज़ोर के आगे ज़लील
कर रहे हैं नातवाँ मुल्कों पे हमले बे दलील
ज़अफ़ ईमां का मुसलमाँ हो गया है यूँ शिकार
हो रहा है इस जगत में इसलिये रुसवा-वो-ख्वार
है नहीं इस्लामियों का कोई अनवर खैर-ख्वाह
चाहते हैं सब यही कि क़ौम मुस्लिम हो तबाह
–––