by Nazar | Aug 8, 2015 | Homepage
– ग़ज़ल – वो सज़ा पाते हैं जिनकी है खता कोई नहीं जानते तो सब हैं लेकिन बोलता कोई नहीं काँधे से काँधा मिलाया दिल से दिल हाथों से हाथ और उस पर यह कि अब मुझसे बुरा कोई नहीं बस खुदा रक्खे तो रक्खे वरन् बहरे ग़म में हम ऐसी कश्ती पर हैं जिसका नाखुदा कोई नहीं वह किराये की हिफ़ाज़त में उन्हें खतरा ही क्या पूछ्िये उनके कि जिनका आसरा कोई नहीं जब वफ़ा का नाम लेना भी है अब जुर्मो खता तुझसे अब शिकवा मुझे ऐ बेवफ़ा कोई नहीं मौत आ कर उम्र भर की हमसफ़र अब हो गई ज़िन्दगी अब तुझसे मेरा वास्ता कोई नहीं कितने राही कितने सालिक और कितने राह रौ ढँढें अपनी अपनी मन्जि़ल रास्ता कोई नहीं...
by Nazar | Aug 8, 2015 | Homepage
– ग़ज़ल – माना कि उनसे दूर का भी वास्ता नहीं राहें जुदा जुदा सही मन्जि़ल जुदा नहीं तूफाँ डरा रहा है हमें क्यों ये बार बार क्या उसका ही खुदा है हमारा खुदा नहीं गिरने के बाद उठने की उम्मीद है मगर नज़रों से गिर गया जो कभी फिर उठा नहीं आराम गाहे ताज यह जमना की खामशी शब भर की चाँदनी से अभी दिल भरा नहीं तेरे बग़ैर क्या कहें अब ज़िन्दगी का हाल कटने को कट रही है मगर कुछ मज़ा नहीं उनका खयाल उनकी तमन्ना उन्हीं का ग़म क्या चीज़ की कमी है मेरे पास क्या नहीं सालिक ये कहता रह गया कर दीजिये मुआफ़ कहने को मैं बुरा हूँ मगर दिल बुरा नहीं...
by Nazar | Aug 8, 2015 | Homepage
– ग़ज़ल – न कोई चेहरा न पत्थ्रर न आइना हूँ मैं तेरी निगाह में आखिर बता कि क्या हूँ मैं चलो यह माना कि कश्ती के नाखुदा तुम हो बचा सको तो बचा लो कि डूबता हूँ मैं कनारे आके सफ़ीने के साथ डूब गया बड़ा गुरूर था कहता था नाखुदा हूँ मैं यह सोचता हूँ तो दिल डूबने सा लगता है कि रंगे खून तो एक है मगर जुदा हूँ मैं तुम अच्छे लोगों को ढूँढो न ढूँढ पाओगे हमेशा मैं ही मिलूँगा बहुत बुरा हूँ मैं लगा लो सीने से या बेरुखी से बात करो करो सोलूक जो चाहो अब आ गया हूँ मैं यह जानकर कि वह बेगाना हो गया सालिक न जाने क्यों उसे अपना ही कह रहा हूँ मैं...
by Nazar | Aug 8, 2015 | Homepage
– ग़ज़ल – जो मुहब्बत से दी नहीं जाती वह तबीयत से पी नहीं जाती एक ही घूँट हो मुहब्बत से उम्र भर बेखुदी नहीं जाती प्यार दुनिया में बाँटते रहिये दिल में यह शै रखी नहीं जाती दिल तो कहता है और थोड़ी सी इतनी पी है कि पी नहीं जाती कुछ तो आदाबे गुफ़तगू सीखो इस तरह बात की नहीं जाती बस उसी से कि जिससे कहना है दिल की हालत कही नहीं जाती जाने वाला तो जा चुका सालिक एक उसकी कमी नहीं जाती...
by Nazar | Aug 8, 2015 | Homepage
– ग़ज़ल – फ़रेब खाए हैं इतने कि कुछ शुमार नहीं हमें अब अपने ही साये पे एतबार नहीं दिखावा प्यार का करते हैं सब जहाँ वाले किसी के दिल में किसी के लिये भी प्यार नहीं किसी के हिस्से में गुल है किसी के हिस्से में खार बहार कहने को कहिये मगर बहार नहीं किसी के ग़म पे किसी को खुशी का हक़ हासिल किसी को ग़म भी मनाने का अख्तियार नहीं हमें न समझो हमें देख कर न पहचानो हमारे चेहरे पे इतना अभी गुबार नहीं सुकनो–अम्नो–अमां ढूँढने कहाँ जायें जिधर भी देखिये हालात साज़गार नहीं शरीके ग़म वही अपना हुआ है ऐ सालिक कि जिसके दिल में हमारी तरह क़रार नहीं...
by Nazar | Aug 8, 2015 | Homepage
– ग़ज़ल – शाखे गुल है कि ये तलवार खिंची है यारो बाग़ में कैसी हवा आज चली है यारो कौन है खौफ़ज़दा जश्ने सहर से पूछो रात की नब्ज तो अब छूट चली है यारो ताक के दिल से दिले शीशा–ओ पैमाना तक एक एक बूँद में सौ शम्मा जी है यारो चूम लेना लबे लाली का है रिन्दों को रवा रस्म ये बादये गुल गूँ से चली है यारो सिर्फ एक गुन्चा से शर्मिन्दा है आलम की बहार दिले खूँ गश्ता के होटों पे हँसी है यारो वो जो अंगूर के खोशों में थी मानिन्दे नोजूम ढल के अब जाम में खुरशीद बनीं है यारो बू ए खूँ आती है मिलता है बहारों का सुराग़ जाने किस शोख सितमगर की गली है यारो ये ज़मीं जिससे है हम खाक नशीनों का ओरूज ये जमीं चाँद सितारों में घिरी है यारो जुर्रए तल्ख भी है जाम गवारा भी है जिन्दगी जश्न गहे बादा कशी है यारो...