हो जायें जो ़़़

                    – ग़ज़ल – हो जाएं जो सरगरमे अमल अहले ज़मीं और दुनिया यही हो जाएगी फिर कितनी हसीं और ऐ दिल तेरे हाथों हुआ बरबाद बहुत कुछ अब अपनी तबाही मुझे मन्ज़ूर नहीं और कह सुन के ज़रा आप ही अब उनको मनाएं दीवाने यहाँ से न चले जाएं कहीं और संगे दरे जानां भी यहीं खिंच के चला आए बढ़ जाए जो थोड़ा सा मेरा ज़ौक़े यक़ीं और एक रोज़ मेरे ख़ानए दिल में भी मकीं हो दिल में तेरी उल्फ़त के सिवा कुछ भी नहीं और सइयाद का बस जब नहीं चलता किसी सूरत फिर दाम बिछाता है वो हमरंगे ज़मीं और कहते हुए डरता हूँ ग़मे दिल का फ़साना सुनते हैं कहीं आप न हों चीं बजबीं और परदे से निकल कर कभी जलवा तो दिखा दे कुछ इसके सिवा आरज़ू जौहर को नहीं और...

यकीं हो गया ़़़

– गजल – यकीं हो गया बागबां के चलन से अभी दूर है मौसमे गुल चमन से करें साजिशें रहनुमा राहजन से नहीं काम चलने का अब मकरो फन से तेरी बज्मे रंगीं का क्या हश्र होगा अगर उठ गये हम तेरी अंजुमन से ये सच है तअल्लुक है जम–जम से मुझको मोहब्बत भी रखता हूँ गंगो जमन से कभी पत्थरों से न कुछ जर्ब पहुँची कभी चोट आई गुलो नस्तरन से सदाकत परस्ती है जब अपना मसलक हमें खौफ फिर क्यों हो दारो रसन से तुम्हारे लिये जिन्दगी वक्फ कर दी तुम्हें और क्या चाहिये अह्लेफन से तमाशा जरा देखिये सुब्हे नौ का एजाफा अंधेरे में है हर किरन से नहीं कुजकलाहों को दौरां शनासी निकलते हैं अब भी उसी बांकपन से हुआ खून जौहर मेरी हसरतों का जो पाला पड़ा एक पैमां शिकन से...