चार दिन की चाँदनी़…….

———— ग़ज़ल ———– चार दिन  की चाँदनी है फिर अंधेरी रात है वो भी अपना हक नहीं है आपकी सौग़ात है कोई न कोई मेरा हर दिन दुखा जाता है दिल मेरे घर आके बता जाता मेरी औकात है अच्छे दिन की मुझको भी उम्मीद थी पर क्या कहूँ मुश्किलों की रात दिन बढ़ती रही तादात है मेरी ग़ज़लों को सुने बिन आप जा सकते नहीं अपनी गा के चल दिये हो ये भी कोई बात है दूल्हे बिन बारात मेरी जिन्दगी का है सफर दाल थाली में नहीं है सिर्फ चटनी भात है सूचियों में छप नहीं पाता कभी ‘साकार‘ है जाने कैसा नाम मेरा जाने कैसी जात है...

जीवन वृत्त

निरंकार शुक्ल ‘साकार‘ जन्म तिथि– 15-06-1973 पिता– स्व० रामरक्षे शुक्ल माता– श्रीमती आनन्दकली देवी जन्म स्थान– ग्राम–पिपरी रोहुआ, तहसील–रावतगंज, जिला–गोन्डा (उ०प्र०) वर्तमान पता– अमवां, फर्टिलाइजर, गोरखपुर (उ०प्र०) शिक्षा– विज्ञान स्नातक (बी०एस०सी०) मोबाइल सं० 9005400902 –––...

जीवन है एक डगर सुहानी

जीवन है एक डगर सुहानी सुख दुःख इसके साथी हैं, कर संघर्ष हमें जीवन में मंजिल अपनी पानी हैं । बड़ी दूर है मंज़िल अपनी लंबा बड़ा है इसका रास्ता, चलता रह बस तू चलता रह पाकर मंजिल लेना सस्ता। चल दिखला दे सबको तू बाकी तुझमें जो जवानी है, कर संघर्ष हमें जीवन में मंजिल अपनी पानी है। मानो मेरी बात सखे तुम जीवन को न व्यर्थ गँवाना, याद रखे तुझको ये दुनिया कर्म कुछ ऐसे करके जाना। इतिहास के पन्नों पर लिखनी एक नयी कहानी है। कर संघर्ष  हमें जीवन में मंजिल अपनी पानी है। चलते रहना सदा ओ राही मंजिल तुझको मिल जायेगी, बस तू थोडा धैर्य रखना मेहनत तेरी रंग लाएगी। करके रहना उसको पूरा मन में जो तूने ठानी है। कर संघर्ष हमें जीवन में मंजिल अपनी पानी...

साथ जबसे तुम्हारा मिला

साथ जबसे तुम्हारा मिला सारी दुनिया बदल सी गई। प्रेम का पुष्प जब से खिला सारी दुनिया बदल सी गई। बदला बदला सा मौसम यहां बदली बदली फिजायें यहां। पेड़ पौधे सभी झूम कर प्रेम के गीत  गायें  यहां। मन में जबसे ये तूफां उठा सारी दुनिया बदल सी गई, प्रेम का पुष्प जबसे खिला सारी दुनिया बदल सी गई। गुल खिले मन में गुलशन खिले आप जबसे  हमें  हो  मिले। आप से महका आँगन मेरा भूल बैठे सभी हम गीले। सर पे छाया अजब सा नशा सारी दुनिया बदल सी गई, प्रेम का पुष्प जबसे खिला सारी दुनिया बदल सी गई। चाँद  तारों  में  देखूं  तुझे सब नज़ारों में  देखूं  तुझे। आइना सामने राखकर अपनी आँखों में देखूं तुझे। जबसे दिल ये दीवाना हुआ सारी दुनिया बदल सी गई, प्रेम का पुष्प जबसे खिला सारी दुनिया बदल सी...

और न कुछ भी चाहूँ

और न कुछ भी चाहूँ तुझसे बस इतना ही चाहूँ। अपने हर एक जन्म में सिर्फ तुझको ही माँ में पाऊं। और न कुछ भी चाहूँ। लाड़ प्यार से मुझको पाला पिला पिला ममता का प्याला। गिरा जब जब में तूने संभाला तुझसे है जीवन में उजाला। माँ तेरे बलिदान को में शत् शत् शीश नवाऊँ। और न कुछ भी चाहूँ। हर पल मेरी चिंता रहती मेरे लिए दुःख दर्द है सहती। रहे सदा खुश मेरा बेटा सिर्फ यही एक बात है कहती। क़र्ज़ बहुत है तेरा मुझपर कैसे इसे चुकाऊं। और न कुछ भी चाहूँ। माँ मेरी ममता की मूरत ईश्वर की लगती है सूरत। एक अगर जो साथ माँ दे तो नही किसी की मुझे जरुरत। तेरे खातिर मेरी माँ में तो कुछ भी कर जाऊँ। और न कुछ भी चाहूँ, अपने हर एक जन्म में सिर्फ तुझको ही माँ में...