by Nazar | Oct 18, 2015 | Meena Kumari Naaz
– ग़ज़ल – उदासियों ने मेरी आत्मा को घेरा है रुपहली चाँदनी है और घुप अंधेरा है कहीं कहीं कोई तारा कहीं कहीं जुगनू जो मेरी रात थी वो आपका सवेरा है क़दम क़दम पे बगोलों को तोड़ते जायें उधर से गुज़रे गा तो रास्ता ये तेरा है ओफ़क़ के पार जो देखी है रोशनी तुमने वो रोशनी है खुदा जाने या अंधेरा है सेहर से शाम हुई शाम को ये रात मिली हर एक रंग समय का बहुत घनेरा है ख़ुदा के वास्ते ग़म को भी तुम न बहलाओ इसे तो रहने दो मेरा यही तो मेरा है —– (फिल्म अभिनेत्री स्व0 मीना कुमारी...
by Nazar | Oct 18, 2015 | FAMOUS
– ग़ज़ल – घबरा गये हैं वक्त की तनहाइयों से हम उकता चुके हैं अपनी ही परछाइयों से हम साया मेरे वजूद की हद से गुज़र गया अब अजनबी हैं आप शनासाइयों से हम ये सोच कर ही खुद से मोख़ातिब रहे सदा क्या गुफ़्तगू करेंगे तमाशाइयों से हम अब देंगे क्या किसी को ये झोंके बहार के मांगें गे दिल के ज़ख़्म भी पुरवाइयों से हम जर्रीन क्या बहारों को मुड़ मुड़ के देखिये मानूस थे ख़ेज़ाँ की दिल आसाइयों से हम —– (शायरा- अफ़त...
by Nazar | Oct 18, 2015 | Homepage
– ग़ज़ल – मुझे कहाँ मेरे अन्दर से वो निकाले गा पराई आग में कोई न हाथ डाले गा वो आदमी भी किसी रोज़ अपनी खि़लवत में मुझे न पा के कोई आईना निकाले गा वो सब्ज़ डाल का पन्छी मैं एक ख़ुश्क दरख़्त ज़रा सी देर में वो अपना रास्ता ले गा मैं वो चिराग़ हूँ जिसकी जि़या न फैले गी मेरे मिज़ाज का सूरज मुझे छुपा ले गा कुरेदता है बहुत राख मेरे माज़ी की मैं चूक जाऊँ तो वो उंगलियाँ जला ले गा वो एक थका हुआ राही मैं एक बन्द सराय पहुँच भी जायेगा मुझ तक तो मुझसे क्या ले गा —– (शायरा- स्व0 दाराब बानो...
by Nazar | Oct 18, 2015 | Homepage
– ग़ज़ल – आलम ही और था जो शनासाइयों में था जो दीप था निगाह की परछाइयों में था वो बेपनाह ख़ौफ़ जो तनहाइयों में था दिल की तमाम अन्जुमन आराइयों में था एक लम्हए-फ़ोसूँ ने जलाया था जो दिया फिर उम्र भर ख़याल की रानाइयों में था एक ख़्वाब गूँ थी धूप थी ज़ख़्मों की आँच में एक सायेबाँ सा दर्द की पुरवाइयों में था दिल को भी एक जराहते-दिल ने अता किया ये हौसला कि अपने तमाशाइयों में था कटता कहाँ तवील था रातों का सिलसिला सूरज मेरी निगाह की सच्चाइयों में था अपनी गली में क्यों न किसी को वो मिल सका एतमाद बादिया-पैमाइयों में था इस अह्दे ख़ुद सिपास का पूछो न माजरा मसरूफ़ आप अपनी पज़ीराइयों में था उसके हुज़ूर शुक्र भी आसाँ नहीं अदा वो जो ग़रीबे-जान मेरी तनहाइयों में था —– (शायरा- स्व0 अदा जाफरी,...
by Nazar | Oct 18, 2015 | Homepage
– ग़ज़ल – मैं किस मन्जि़ल पे पहुँचा हूँ खुदारा देखते जाओ सहारा पा के भी हूँ बे सहारा देखते जाओ हुए तुम किस लिये बरहम खुदारा ये तो बतलाओ हमें ये बरहमी भी है गवारा देखते जाओ मुबारक हो तुम्हें जश्ने बहाराँ ऐ चमन वालो मगर अब जल रहा है घर हमारा देखते जाओ मोहब्बत को मोहब्बत की नज़र से लूटने वालो किया किस हाल में हमने गुज़ारा देखते जाओ कोई देखे न देखे हाले सफ़वी ग़म नहीं लेकिन तड़पता है तुम्हारे ग़म का मारा देखते जाओ ––– (शायर– सफ़वी बाराबंकवी...