by Nazar | Aug 11, 2015 | Dr. Pratibha Singh
( मत जन्म दो ) मत जन्म दो, माँ, मुझे इस दुनिया में नहीं जीना है कष्ट, वेदना, तिरस्कार छोटी सी उम्र में बलात्कार और तो और जमाने भर की दुत्कार रोज मौत का जहर मुझे नहीं पीना है माँ मुझे नहीं जीना है स्वस्थ समाज, स्वस्थ जीवन न दे सको ते मुझे मौत दे दो डरती हो क्यूं, समाज से, कानून से, ममता से इस जीवन से हंसी मौत बेखौफ दे दो माँ, मुझे मौत दे दो मुझे तो, अपनो से डर है, गैरो से भी स्वयं से लाचार हूँ औरों से भी जब कोई अपना मेरी अस्मिता से खेलेगा जब कोई गैर मुझे कामुक नजरों से भेदेगा उस क्त को माँ, तुझे भी तेरी इज्जत प्यारी होगी मेरी जिन्दगी नहीं तेरे गिरते हुए आँसू मुझे आत्महत्या पर मजबूर करेंगे तब तो तुझे शर्म नहीं आयेगी जब, इस दुनियां से मेरी अर्थी उठ जायेगी इसलिए माँ, मुझे नहीं जीना है हर रोज मौत का जहर मुझे नहीं पीना है माँ, मुझे नहीं जीना है। ...
by Nazar | Aug 11, 2015 | Dr. Pratibha Singh
( चौखट हूँ मैं ) मैं, चौखट हूँ, सजोये रखी है मैंने कई वर्षों की यादें न भूली हैं अबतक वो बीती हुई बातें पिछली तीन पीढि़यों से इस घर की देखभाल करने में लगा हूँ हर मित्र और शत्रु से मेरे अपनों की ढाल बनने में लगा हूँ याद आता है मुझे मेरे अस्तित्व में होने का वो पल जैसे लगता है अभी तो बीता है वो कल शुभ मुहूर्त में पवित्र मन्त्रों के मध्य घर के प्रथम द्वार पर लोगों ने मुझे बैठाया था उस दिन तो गोतिनों ने भी क्या खूब गीत गाया था तबसे, इस घर की सीमा से बंधा हूँ पर्दे में पैबंद सीने में लगा हूँ पर जबसे बुजुर्गों की आँखे नम होने लगी है मेरी भी इज्जत घर में कम होने लगी है। मुझे अब तो घर में कोई पूजता नहीं है जैसे बुजुर्गों को कोई पूछता नहीं है फिर भी, मेरे अन्दर विश्वास है, सुरक्षा है, प्यार है वैसे तो कहने को अपना संसार है सच ये है, मेरे बाहर की दुनियाँ तो बस एक व्यापार है मैं चौखट हूँ हाँ मैं चौखट हूँ। ...
by Nazar | Aug 11, 2015 | Abdul Rasheed 'Jugnu'
– व्यंग कविता – पुलिस चमड़े का सिक्का चलाय रही है और फर्जी इन्काउन्टर देखाय रही है बेगुनाहों को खूब सताय रही है तथा गुन्डों से दामन बचाय रही है शायरी जुगनू की आँसू बहाय रही है शायरी जुगनू की —– नौकर शाही रिश्वत में नहाय रही है इमदाद की वह सारी रकम खाय रही है काग़ज़ी घोड़ा खुश्की में दौड़ाय रही है और जनता को अंगूठा दिखाय रही है शायरी जुगनू की —– झिल्ली सुरा की शोर मचाय रही है मस्ती मांझी की नइया डुबाय रही है गुन्डई गंगू की रंग जमाय रही है इन्सानियत बेचारी लुकाय रही है शायरी जुगनू की —–...
by Nazar | Aug 11, 2015 | Abdul Rasheed 'Jugnu'
– व्यंग – फसाद की कड़ी है जादू की छड़ी है घोटालों की जड़ी है अंखियाँ तवायफ से लड़ी हैं नेता बदबू देता, नेता बदबू देता नेता बदबू देता —– टेम्पो इसका हाई है तगड़ी इसकी कमाई है हिस्से में मलाई है इबलीस का भाई है नेता बदबू देता, नेता बदबू देता नेता बदबू देता —– झूठ फरेब का मिक्चर है धोखाधड़ी का पैकर है इसका हसीन लेक्चर है जेब में दारू टिन्चर है नेता बदबू देता, नेता बदबू देता नेता बदबू देता —–...
by Nazar | Aug 11, 2015 | Ayodhya Prasad Vikal
– जीतल महिला प्रधान – सुनिल्या ये पप्पू के बाबू भल घूमत रह्या फुटानी में अब हम घूमब तब पता लगी जीतल बाटी परधानी में अब हम घूमब तब पता लगी जीतल बाटी —- हम पंचइती में जाबे जब तब लड़िकन के बहकाया तू पंचइती से जब घर अइबै तब पानी हमें पिलाया तू कंचित अबेर होइ जाय हमें तब चउका चूल्ह जगाया तू हम आइ जाब रोटी बेलब चट रोटी बैठि सेंकाया तू हम चाहे आइब जाब जहाँ तू मत घूम्या निगरानी में अब हम घूमब तब पता लगी जीतल बाटी —- मीटिंग में कोर्ट कचहरी में साइकिल से हमें पठाया तू हम आगे आगे चलत रहब बस्ता लै पाछे धाया तू हम भाग लेब जब मीटिंग में तब चाय समोसा खाया तू मीटिंग समाप्त होइ गइले पर फिर घर हमकै ले आया तू अब राजनीति हमहूँ करबै राखल बा काव किसानी में अब हम घूमब तब पता लगी जीतल बाटी —- शौचालय गोबर गैस और नाली पुलिया बनवइबै हम सुन्दरीकरन में गाये कै बड़का पोखरा झरवइबै हम गड़ही गड़हा बा जहाँ तहाँ समथर ओके करवइबै हम हर गली कै कचरा दूर करब ईंट सब पर बिछवइबै हम सब झूरे घर आई जाई केहू पाँव धरी न पानी में अब हम घूमब तब पता लगी जीतल बाटी —- कहि लेखपाल से गायें कै सगरो चकरोड पटवइबै हम सूअर मुर्गी मछली पालन जे चाही उसे देवइबै हम बंजर कै होई भूमि जहाँ पट्टा आके कै नइबै हम गाँयें कै झगड़ा छोट मोट–सब घर ही पर निपटइबै हम समझाइ के राखब सबही के जाये न देब दिवानी में अब हम घूमब तब पता लगी जीतल बाटी —- महिला का हमें समझला...