by Nazar | Aug 11, 2015 | Dr. Ishwar Chandra Tripathi
असली चेहरा-नक़ली चेहरा देख लिया कफ़न बँधा मैंने इक सेहरा देख लिया, असली चेहरा-नक़ली चेहरा देख लिया। घर की दीवारों को जबसे कान हुए, इन्सानों को गूँगा-बहरा देख लिया। मिट्टी के कारिन्दे सोने की ख़न्जर, आँखों के पहरों पर पहरा देख लिया। घूँघट में ज्वालामुखियाँ, लहरों में लपटें, दिल को सागर से भी गहरा देख लिया। तुम भी मेरे साथ चढ़ोगे शूली पर, मैंने भी क्या ख़्वाब सुनहरा देख लिया।...
by Nazar | Aug 11, 2015 | Dr. Ishwar Chandra Tripathi
गंगा-यमुना का आलिंगन रूक जाये कहाँ कोई क्या जाने तेरी साँसे मेरी धड़कन, रूक जाये कहाँ कोई क्या जाने, गंगा-यमुना का आलिंगन, रूक जाये कहाँ कोई क्या जाने। गंगा-यमुना का आलिंगन……………….। तुम रूप नगर में रहते हो, मैं चित्र बनाने वाला हूँ। सूरज और चाँद-सितारों को, धरती पर लाने वाला हूँ। रूक जाओ अभी दो पल ही सही, मैं खुद ही आने वाला हूँ। तेरा-मेरा ये आकर्षण, रूक जाये कहाँ कोई क्या जाने।। गंगा-यमुना का आलिंगन……………….। सावन की घटा, फागुन की छटा, ऋतुओं का दौर नया होगा, पदचिन्ह निहार रहा हूँ मैं, तुम सा भी कोई गया होगा। तुम मान गये तो, जग माना, तुम रूठ गये तो क्या होगा।। तेरी बहकी-बहकी चितवन, रूक जाये कहाँ कोई क्या जाने। गंगा-यमुना का आलिंगन……………….। देखो न मुझे हसरत की नजर, मैं अपने में अलबेला हूँ, उठते-गिरते मृदु भावों का, इक चलता-फिरता मेला हूँ। राही तो बहुत गुजरे हैं मगर, इस पथ पर आज अकेला हूँ, साँसो-साँसों का ये बन्धन, रूक जाये कहाँ कोई क्या जाने। गंगा-यमुना का आलिंगन……………….।...
by Nazar | Aug 11, 2015 | Dr. Ishwar Chandra Tripathi
सृजन करता जा रहा हूँ सृजन करता जा रहा हू सृजन करता जा रहा हूँ। देखता हूँ टूट करके बिखरता है हर खिलौना, फिर भी किसके वास्ते सजता-संवरता जा रहा हूँ ? सृजन करता………………। एक अन्जाने मुसाफिर की तरह कुछ गीत लिखकर एक चैराहे से आकर दूसरे पर रूक गया हूँ। पूछते हैं जब सभी परिचय हमारा पास आकर, तब बताता हूँ कि मैं कल था नया, अब भी नया हूँ। क्या बताऊँ और जब इस जि़न्दगी के रास्ते पर एक क्षण बनता हूँ अगले क्षण बिखरता जा रहा हूँ। सृजन करता……………..। एक पखवारा अन्धेरों से लिपट कर हमने देखा चाँद काला हो गया है। बुझ रहा है रोज सूरज राख बनकर पवन वीरानों में जाकर सो गया है।। जब प्रलय प्रतिबिम्ब आँसू में उभरते जा रहे हैं सोचता हूँ फिर भी मैं क्यों आह भरता जा रहा हूँ सृजन करता…………………। दुध मुँहे संगीत, यौवन छू न जाये गगन की दीवार बोझिल हिल रही है। पीस कर मुट्ठी में मेंहदी का कलेजा रोज सूरज को चुनौती मिल रही है।। खाँसती है उम्र जब करवट बदलकर काल हँसता सोचता हूँ पग बढ़ाकर क्यों ठहरता जा रहा हूँ ? सृजन करता…………………..।...
by Nazar | Aug 11, 2015 | Dr. Pratibha Singh
( मैंने देखा ) मैंने देखा! जब शीत भी दुबककर रजाई ओढ़े हुए थी और धूप बैठकर आग ताप रही थी फटे और मटमैले कपड़े में लिपटी उस नन्ही सी काया को जो, सड़क के किनारे पड़े कचरे के ढेर में अपनी किस्मत खोज रहा था करीब आठ वर्ष का बालक जबान से तो चुप था मैं आखों से बोल रहा था उसमें बच्चों जैसी चंचलता कहाँ थी बचपन में बचपन खोकर जीवन को खोज रहा था कभी ऊँची अट्टालिकाओं को देखता तो कभीं कचरा उठाता एक नजर उसने मेरी तरफ भी देखा फिर अपने काम में लग गया पता नहीं, ये नफरत की नजर थी या दर्द भरी पर मैं, अबतक नहीं भूली वो चेहरा निश्च्छल मौन ये सोच रही हूँ अब भी आखिर दोषी कौन ? आखिर दोषी कौन ? ...
by Nazar | Aug 11, 2015 | Dr. Pratibha Singh
(हर शाम को दिये संग जलते हुए देखा है) हर शाम को दिये संग जलते हुए देखा है इस उम्र को वक्त संग ढ़लते हुए देखा है क्यों ? रात की खामोशियों में दिल उदास हो गया पीछे कभी हैं देखते, पाया है क्या,क्या खो गया किसकी तलाश में ताउम्र घूमते रहे समझा नहीं कभी हम फिर भी ढूँढते रहे और भी, गहरा गया है यह अंधेरा दिल के पंक्षी को न जाने चाहिए कैसा बसेरा रात के इस धुंधलके को एक किरण मिल जाये तो हर मन की रेतीली जमीं पर एक कली खिल जाये तो हर शाम जलना छोड़ दे यह वक्त ढ़लना छोड़ दे रात की खामोशियों में दिल पिघलना छोड़ दे बर्सात ऐसी आये जिसमें हर गिले धुल जायें प्रेम की गंगा से दिल के द्वार भी खुल जायें राह मत रोको इस सरिता को अब बहने दो बस मनुष्यता फिर सांस ले ऐसी हवा चलने दो अब। ...