तुम्हारी बज्म में कुछ ़़़

– गजल – तुम्हारी बज्म से कुछ बावकार हैं हम भी कुछ बुलन्दी के हिस्सेदार हैं हम भी न ऐब सारे कभी दूसरों में तुम देखो इस जमाने में गुनहगार हैं हम भी शहर की महफिलों में रोशनी है हमसे ही और अंघेरों के जिम्मेदार हैं हम भी कोशिशें खूब कीं उसने हमें डुबोने की अपने दम से मगर दरिया के पार हैं हम भी छोडकर तुझको अब जाऐं तो कहां जाऐं हम तेरी जुल्फों में गिरफतार हैं हम भी...

ग़ज़ल की जान ़़़

– गजल – गजल की जान होने बाला है जमींसे आसमान होने बाला है कल तलक जो हाशिये पर था बज्म की शान होने बाला है लिख रहा जो कृष्ण पर गजलें अब वो रसखान होने बाला है जो कुचलता है खिलती कलियों को वो भी अब शमशान होने बाला है शायद उसको तरक्कियाँ खा जायें शोहरतों का गुमान होने बाला है...

तुम्हारी याद का हरदम ़़़

– ग़ज़ल – तुम्हारी याद का हरदम खजाना साथ रहता है फकत तुम ही नहीं रहते जमाना साथ रहता है तमन्ना वो भी रखता है हमारे पास आने की मगर मजबूरियां कुछ है बहाना साथ रहता है मजा आता है अक्सर रूठने में और मनाने में किसी के रूठने में भी मनाना साथ रहता है हुये हम बेबजह बदनाम उनसे दिल लगा करके वो आते हैं कभी मिलने तो जाना साथ रहता है उसी की जिन्दगी कटती अमित दुख दर्द में देखी किसी की जिन्दगी में जब बेगाना साथ रहता है अमित खरे...

मुस्काना जब भी चाहे ़़़

मुस्काना जब भी चाहे, रूलाये गये है हम हँस-हँस के याद भुलाये गये हैं हम, कैसे बतायें कितना सताये गये हैं हम। क़ुदरत का करिश्मा है कि हम सामने खड़े, वरना हज़ार बार मिटाए गये हैं हम। अपनों ने मुझे बेंचा है, गैरों ने खरीदा, हर रोज़ ख़जाने से चुराये गये हैं हम। मत जि़न्दगी के जश्न की तस्वीर माँगिये, मुस्काना जब भी चाहे, रूलाये गये हैं हम। ऐसे चिराग़ जिसमें की बाती न तेल है, तूफान में बेख़ौफ जलाये गये हैं हम। श्मशान पर जब आँख खुली तो समझ गये, करने के लिए क़त्ल जिलाये गये हैं हम।...

मुक्तक ़़़

मुक्तक (कतात) (1)   सत्य पर आवरण नहीं होता वक्त का आचरण नहीं होता आसुओं ने बताया आॅखों को दर्द का व्याकरण नहीं होता। (2)   फिर मुझे याद कर रहा कोई वक्त बरबाद कर रहा कोई अपनी परिभाषा देके लौटा है मेरा अनुवाद कर रहा कोई। (3)   खुद से अनबन सी हो गयी मेरी सास दुश्मन सी हो गयी मेरी बर्फ की आग में जला जबसे देह कुन्दन सी हो गयी मेरी। (4)   अपनी पहचान लेके भेज दिया, हाथ में जान लेके भेज दिया। भूख ने मुझको साॅप के घर में, बीन की तान लेके भेज दिया। (5)   मुस्कुराये कभी मलीन हुए बहते पानी के आबगीन हुए। जिन्दगी बन के तमाशा गुजरी, और हम खुद तमाशबीन हुए।...