by Nazar | Aug 15, 2015 | Pankaj Vatsyayan
मैं अकेला नहीं हूँ व्याकुल, व्यवस्था, के विकृत स्वरूप से। विह्वल व्यथित, मैं अकेला नहीं हूँ।। और भी मन हैं, विद्रोह की तैयारी में। क्रोधित आक्रोशित, मैं अकेला नहीं हूँ।। गर परिवर्तन का वादा, पूरा नहीं हुआ महोदय। तो उखाड़ फेंके जाओगे, क्योंकि; मैं अकेला नहीं हूँ।। ये बच्चे वच्चे की चिंता, आप जनता पर छोड़ो। अच्छे दिन के लिए प्रयास करो। वर्ना दफनानें की तैयारी में; मैं अकेला नहीं हूँ।। जिसनें भी जनता के सपनों, से खिलवाड़ किया है। निश्चित ही उनको, मिटा दिया गया है। इसके गवाह बहुत से हैं; मैं अकेला नहीं हूँ।। ...
by Nazar | Aug 15, 2015 | Pankaj Vatsyayan
पेट की आग रोकिये साहिब शीत का असर देखिये साहिब इलाज़ मौत का कीजिये साहिब मकान नंबर से कहाँ पता चलेगा वो बेघर है पूछिये साहिब दर्द से वो बहुत बेहाल है दवा कोई न दीजिये साहिब सच तो है के बहुत ये भूखा है इसको रोटी तो दीजिये साहिब कब कहा इसनें भीख दो इसको सिर्फ दंगा तो रोकिये साहिब बंद जबसे शहर है कर्फ्यू से बंद इनकम है सोचिये साहिब कहाँ ज़िंदा रहा है बाप कोई रोते बच्चों को देखके साहिब इससे पहले कि मर जाये वो पेट की आग रोकिये साहिब ...
by Nazar | Aug 15, 2015 | Pankaj Vatsyayan
– अल नीनो से तड़प रहा है – कहने को तो अपने दिल का हाल सुनाकर आया हूँ। अपने मन की पीड़ा का बादल बरसाकर आया हूँ। फिर भी व्याकुल व्यथित बहुत हूँ कैसी पीर नई है भाई। उसकी आँखों के दरिया को दिल में छिपाकर आया हूँ।। कैसे ना ये रूह भीगती उसके बेबस आँसूं से। उसके भूखे बच्चों को मैं आज देखकर आया हूँ।। सच कहता हूँ दर्द का सागर अल नीनो से तड़प रहा। इक तूफान ह्रदय में अपने आज जगाकर आया हूँ।। इसे मात्र धमकी मत समझें कह दो सत्ता धारी से। मैं विचार का दीप अखंडित आज जलाकर आया हूँ।। बच कर रहना तेज़ सुनामी उट्ठेगी इस बार कलम से। इस सत्ता की जड़ें खोखली स्वयं देखकर आया हूँ।।...
by Nazar | Aug 14, 2015 | Amit Khare
– गजल – मुश्किलों में सम्हलना होगा गमों से भी निकलना होगा शौहरतें इतनी आसान कहां खारों के रास्ते चलना होगा मछलियां मर रहीं हैं देखिये अब तो पानी बदलना होगा मुहब्बत की है तो याद रखो ताउम्र तुम्हैं अब जलना होगा शायरी में भी सुनो अमित टूटना होगा बिखरना होगा...
by Nazar | Aug 14, 2015 | Amit Khare
– गजल – सारी शर्तें हुईं कुबूल दरक रहे हैं मगर उसूल वो गुलशन में रहे मगर ऐसे जैसे कोई बबूल सूद कीं बातें हैं बेमानी अब खतरे में दिखता मूल जो तुमने अहसान किये हैं हम जाएंगे कैसे भूल खोला उसने ऐसा मोर्चा रखी हिलाकर सबकी चूल...