by Nazar | Aug 11, 2015 | Ayodhya Prasad Vikal
– कवि सम्मेलन – सच कहता हूँ सच ही कहने से कितनों से बिगाड़ हो गया आज काल्ह कवि सम्मेलन भी नौटंकी और भांड हो गया आज काल्ह कवि सम्मेलन भी नौटंकी और — स्वर स्वरूप की पूजा होती कांच कौन पहचाने मोती श्रोता पलई मार रहा है मानों छुटहर साँड़ हो गया आज काल्ह कवि सम्मेलन भी नौटंकी और — अलंकार रस छन्दादिक अब नयी विधा में हैं बाधित सब संचालक भी बना विदूषक कहता तिल का ताड़ हो गया आज काल्ह कवि सम्मेलन भी नौटंकी और — पैसे पर हम नाच रहे हैं गैर की कविता बाँच रहे हैं मंचों पर जम जाते ऐसे जैसे चोटा खांड हो गया आज काल्ह कवि सम्मेलन भी नौटंकी और — ‘विकल‘ अकल से काम लीजिये मंचों पर तब नाम दीजिये जान लीजिये जबकि अपना कोई सही जुगाड़ हो गया आज काल्ह कवि सम्मेलन भी नौटंकी और —...
by Nazar | Aug 11, 2015 | Ayodhya Prasad Vikal
– गीत – दुखों के दिन मिलते हैं तो सुखों के दिन भी मिलते हैं सरोवर सूखे रहते हैं तो कभी शतदल भी खिलते हैं जब शिशिर के आतंकों से जल–थल ठरने लगते हैं आहत रसाल के पत्ते भी तब झरने लगते हैं पत्ते विहीन होकर टेसू नंगे दिखलाते हैं मंटक मय बन जाते गुलाब पत्ते झर जाते हैं पशु पक्षी सभी ठिठुर करके ठंडक से हिलते हैं संध्या को पूरब प्रात सभी पश्चिम से मिलते हैं आकर बसन्त सबको फिर से नवजीवन देता है हरियाली से भर देता सबका दुख हर लेता है बौराते हैं रसाल के तरु गुलाब खिल जाते हैं नाचती तितलियां फूलों पर भौंरे मडराते हैं पत्ते विहीन टेसू पाकर नव लाली खिलते हैं सुखों के दिन भी मिले हैं दुखों के दिन भी मिलते हैं जब ग्रीष्म के झंझावातों को लू लेकर चलता है अवनी तल का कणकण तृण् तृण सब जलने लगता है पशु पक्षी व्याकुल तृष्णा से अकुलाने लगते हैं अरु हरे–भरे तरुवर भी सब मुरझाने लगते हैं जल से परिपूर्ण सरोवर भी सूखे बन जाते हैं मानो मरुस्थल के चादर भी उन पर तन जाते हैं आती है वर्षा ऋतु नभ में बादल घिर जाते हैं होती है वर्षा सभी नदी नाले भर जाते हैं शीतल हो जाती विकल धरा हरियाली छाती है सुखमय प्राणी फिरते हैं अरु खेती लहराती है भरते हैं सरोवर जल से फिर शतदल भी खिलते हैं सुखों के दिन भी मिलते हैं दुखों के दिन —–...
by Nazar | Aug 11, 2015 | Mukesh Madhur
– बासन्ती गीत – महमहा रहा है भू गगन, लग रहा बसन्त आ गया हो रहा अधीर मन मगन, लग रहा बसन्त आ गया लग रहा बसन्त आ गया —– बादलों के अंचल में, छुप रही सुमीत चाँदनी हर तरफ दिशाओं में, गूँजने लगी है रागिनी चल रही झकोरती पवन, लग रहा बसन्त आ गया लग रहा बसन्त आ गया —– सप्तरंगी पुष्पों से, फूलों के बगान सज रहे गूँज से विहंगों के, मधुमयी बिहान सज रहे खुशबुओं से भर गया गगन, लग रहा बसन्त आ गया लग रहा बसन्त आ गया —– पीली पीली सरसों के, फूलों जैसी लेके ओढ़नी मन चुराने आई है, मुँह छुपाके कौन चोरनी दे रही है मद भरी छुअन, लग रहा बसन्त आ गया लग रहा बसन्त आ गया —– कौन है बड़ा छोटा, भेद भाव मिटने लगे झोंपड़ी की किस्मत के, अन्धकार छँटने लगे मधुर मधुर वर्ष को नमन, लग रहा बसन्त आ गया लग रहा बसन्त आ गया —–...
by Nazar | Aug 11, 2015 | Mukesh Madhur
– ग़ज़ल – प्यार पलता नहीं आतंक के घरानों में फूल खिलता नहीं बारूद के बगानों में मिट ही जाते हैं वही लोग राहजन बनकर खुद जो रखते हैं दवा मौत की दुकानों में जिन्दगी जिन से दुखी होके जुल्म सहती है धर्म की आड़ में मिलते हैं वो ठिकानों में जो भी मुफलिस का यहाँ अम्न चैन छीनेगा जी कहाँ पाएगा अपने ही वो मकानों में हो गये वक्त से पहले वो आज ही बूढ़े जो ग़रीबी में गये कल ही कारखानों में फिर बुलाती है मधुर देख देश की सरहद है कहाँ कोइ तेरे जैसा नव जवानों में...
by Nazar | Aug 11, 2015 | Mukesh Madhur
– ग़ज़ल – प्यार के नाम पर कुछ किया कीजिये दुश्मनों से भी खुल के मिला कीजिये मन से तम को मिटा दें सदा के लिये प्यार की जोत बन कर जला कीजिये चाँद कब तक घटाओं में छुपता रहे चाँद पर आवरण मत किया कीजिये है फ़िज़ा में घुला नफ़रतों का ज़हर बनके खुशबू हवा में बहा कीजिये वो तिमिर हो कि कोई भी परिवेश हो फूल सा कंटकों में खिला कीजिये इश्क़ में सर भी कट जाये क्या ग़म मधुर राहे उल्फत में हर पल बढ़ा कीजिये...