तुम कब आओगे ़़़

– गीत – आये घन कारे परदेशी तुम कब आओगे प्यासे मन की निर्मोही कब प्यास बुझाओगे तुम कब आओगे —– रस गागर छलके आँगन कानन मयूर नाचे पल छ्नि परै न चैन रैन पपीहा पाती बाँचे बीत गई जो ऋतु बहार की फिर पछताओगे तुम कब आओगे —– कब मधुर मिलन की मन में आस बसाये हैं स्वागत में सुरभित सुमनों की सेज सजाये हैं यौवन की पूँजी लुट जाने पर क्या पाओगे तुम कब आओगे —– रूपजाल में कहीं किसी के कन्त न फँस जाना मन मन्दिर के देव मेरे मत मुझको बिसराना भीगे नयन निहारें पथ कब तक तरसाओगे तुम कब आओगे —– संग संग बीते मधुरिम वे दिन याद आते हैं स्वप्न तुम्हारे सुखद सुहाने बहुत रुलाते हैं गाँव गाँव की माटी को कैसे बिसराओगे तुम कब आओगे —– आये घन कारे परदेशी तुम कब आओगे तुम कब आओगे —–...

हम जबसे ़़़

– ग़ज़ल – हम जबसे मजबूर हो गये अपने हमसे दूर हो गये झूठी दौलत ताकत शोहरत मद में सबके चूर हो गये सज्जन तो गुमनाम रह गये दुर्जन अब मशहूर हो गये कत्ल फरेब झूठ मक्कारी ये तो अब दस्तूर हो गये धन कुबेर और बाहुबली जो शातिर थे मशहूर हो गये हमने उनको राह दिखाया पद पाया मग़रूर हो गये एक आपके आने से ही सबके चेहरे पुरनूर हो गये...

इस बरस बरसा न ़़़

– ग़ज़ल – इस बरस बरसा न सावन खेत प्यासे रह गये कल्पनाओं के सजाये ये घरौंदे ढह गये लौट आए याचना के स्वर निठुर आकाश से आस्था आहत हुई सपने सलोने ढह गये रह गये प्यासे नदी नद नहर घट पनघट सभी मलिन मन सूने नयन अन्तर व्यथा सब कह गये श्याम घन ने पी कहाँ की टेर कर दी अनसुनी प्रिय मिलन की आस के पल आँसुओं में बह गये तप रही धरती तवा सी बने घर आँगन अवाँ लहलहाते धान खेतों में झुलस कर रह गये...

महुआरी मधुरस छलकाये ़़़

– गीत – महुआरी मधुरस छलकाये फागुन में मस्त पवन मकरन्द लुटाये फागुन में मस्त पवन मकरन्द —– विदा विरस पतझार मदिर मौसम आया वासन्ती आँचल धरती का लहराया बंसवारी बाँसुरी बजाये फागुन में मस्त पवन मकरन्द —– महके घर ऑगन विहँसे केसर क्यारी लहके अरुण पलाश जरे तन चिनगारी कोयल राग विहाग सुनाये फागुन में मस्त पवन मकरन्द —– झनके झाँझ मजीरा झूमे सब अमराई झरे फुहार मदन रस मादकता छाई चन्द्र किरन तन तयन बढ़ाये फागुन में मस्त पवन मकरन्द —– पिंहके रात पपिहरा प्रिय की प्रीति जगे खुनक उठे कर में कंगन तन मन उमगे परदेशी प्रिय कन्त न आये फागुन में मस्त पवन मकरन्द —–...

कभी विधर्मी ने लूटा ़़़

– गीत – कभी विधर्मी ने लूटा और लूटा कभी फिरंगी ने आज वतन को लूट लिया नेता बनके शिखण्डी ने कभी विधर्मी ने लूटा —– चपरासी के योग्य नया बनकर बैठा अधिकारी है पापी कामी अधर्म नीच परमेश्वर का पुजारी है न्याय धर्म का मर्म न जाना न्यायाधीश आनन्दी ने कभी विधर्मी ने लूटा —– जरासन्ध धृतराष्ट्र कंस रावण की तानाशाही है कहने को है प्रजातन्त्र पर सच में नौकरशाही है जयचन्दों की जय–जय है अब राजनीति की मण्डी में कभी विधर्मी ने लूटा —– सरकारी वर्दी में गुन्डे अब तो अच्छे लगते हैं हिटलर थामस डलहौजी नाज़ी के बच्चे लगते हैं अन्तर ध्यान धर्म हो गया न्याय की नव नसबन्दी में कभी विधर्मी ने लूटा —– मैकाले की शिक्षा व्यवस्था का करता सम्मान है देवनागरी वैदिक विद्‍या का करता अपमान है शिक्षा का व्यवसाय किया है बुद्धिहीन बहुरंगी ने कभी विधर्मी ने लूटा —– प्रजातन्त्र का जाल बिछाया राजनीति का ज्ञानी है तन्त्र हुआ आबाद यहाँ जनगण की दुखी कहानी है देश किया नीलाम सुरेश उस जन नायक पाखण्डी ने कभी विधर्मी ने लूटा —–...