by Nazar | Aug 8, 2015 | Yaseen Ghayal
– ग़ज़ल – आज जिन्दगी अपनी उलझनों मे कटती है रात भर ये तनहाई सॉप बनके डसती है कौन सुनने वाला है गम की दास्तॉ अपनी आजकल जमाने में आप ही कि चलती है कोई तो बता दे ये है कहॉ मेरा हमदम बार बार मिलने की आरजू मचलती है मैं तो उस पे हर लम्हा जॉनिसार करता था फिर वो बेवफा ऐसी रास्ता बदलती है दफ्न करके जब मैयत मेरी जा चुके घायल तब वो कब्र पे मेरी आके हाथ मलती है ...
by Nazar | Aug 8, 2015 | Yaseen Ghayal
– ग़ज़ल – तुम गरीबों को अपना बनाते चलो प्यार के फूल हरसू खिलाते चलो राह पर खार है तुम न कुछ गम करो कारवॉ अपना आगे बढाते चलो चाहते हो भलाई कुछ अपनी अगर हॉ कदम से कदम तुम मिलाते चलो साफगोई से हरगिज न मुंह मोड़ना हक पसन्दी का नारा लगाते चलो वक्त के उन अंधेरों में अय दोस्तों तुम चरागे मुहब्बत जलाते चलो कर दिया वक्त ने दिल को घायल मगर हौसला और हिम्मत बंधाते चलो ...
by Nazar | Aug 8, 2015 | Homepage
– ग़ज़ल – वो सज़ा पाते हैं जिनकी है खता कोई नहीं जानते तो सब हैं लेकिन बोलता कोई नहीं काँधे से काँधा मिलाया दिल से दिल हाथों से हाथ और उस पर यह कि अब मुझसे बुरा कोई नहीं बस खुदा रक्खे तो रक्खे वरन् बहरे ग़म में हम ऐसी कश्ती पर हैं जिसका नाखुदा कोई नहीं वह किराये की हिफ़ाज़त में उन्हें खतरा ही क्या पूछ्िये उनके कि जिनका आसरा कोई नहीं जब वफ़ा का नाम लेना भी है अब जुर्मो खता तुझसे अब शिकवा मुझे ऐ बेवफ़ा कोई नहीं मौत आ कर उम्र भर की हमसफ़र अब हो गई ज़िन्दगी अब तुझसे मेरा वास्ता कोई नहीं कितने राही कितने सालिक और कितने राह रौ ढँढें अपनी अपनी मन्जि़ल रास्ता कोई नहीं...
by Nazar | Aug 8, 2015 | Homepage
– ग़ज़ल – माना कि उनसे दूर का भी वास्ता नहीं राहें जुदा जुदा सही मन्जि़ल जुदा नहीं तूफाँ डरा रहा है हमें क्यों ये बार बार क्या उसका ही खुदा है हमारा खुदा नहीं गिरने के बाद उठने की उम्मीद है मगर नज़रों से गिर गया जो कभी फिर उठा नहीं आराम गाहे ताज यह जमना की खामशी शब भर की चाँदनी से अभी दिल भरा नहीं तेरे बग़ैर क्या कहें अब ज़िन्दगी का हाल कटने को कट रही है मगर कुछ मज़ा नहीं उनका खयाल उनकी तमन्ना उन्हीं का ग़म क्या चीज़ की कमी है मेरे पास क्या नहीं सालिक ये कहता रह गया कर दीजिये मुआफ़ कहने को मैं बुरा हूँ मगर दिल बुरा नहीं...
by Nazar | Aug 8, 2015 | Homepage
– ग़ज़ल – न कोई चेहरा न पत्थ्रर न आइना हूँ मैं तेरी निगाह में आखिर बता कि क्या हूँ मैं चलो यह माना कि कश्ती के नाखुदा तुम हो बचा सको तो बचा लो कि डूबता हूँ मैं कनारे आके सफ़ीने के साथ डूब गया बड़ा गुरूर था कहता था नाखुदा हूँ मैं यह सोचता हूँ तो दिल डूबने सा लगता है कि रंगे खून तो एक है मगर जुदा हूँ मैं तुम अच्छे लोगों को ढूँढो न ढूँढ पाओगे हमेशा मैं ही मिलूँगा बहुत बुरा हूँ मैं लगा लो सीने से या बेरुखी से बात करो करो सोलूक जो चाहो अब आ गया हूँ मैं यह जानकर कि वह बेगाना हो गया सालिक न जाने क्यों उसे अपना ही कह रहा हूँ मैं...