जो मुहब्बत से ़़़

– ग़ज़ल – जो मुहब्बत से दी नहीं जाती वह तबीयत से पी नहीं जाती एक ही घूँट हो मुहब्बत से उम्र भर बेखुदी नहीं जाती प्यार दुनिया में बाँटते रहिये दिल में यह शै रखी नहीं जाती दिल तो कहता है और थोड़ी सी इतनी पी है कि पी नहीं जाती कुछ तो आदाबे गुफ़तगू सीखो इस तरह बात की नहीं जाती बस उसी से कि जिससे कहना है दिल की हालत कही नहीं जाती जाने वाला तो जा चुका सालिक एक उसकी कमी नहीं जाती...

फ़रेब खाए हैं ़़़

– ग़ज़ल – फ़रेब खाए हैं इतने कि कुछ शुमार नहीं हमें अब अपने ही साये पे एतबार नहीं दिखावा प्यार का करते हैं सब जहाँ वाले किसी के दिल में किसी के लिये भी प्यार नहीं किसी के हिस्से में गुल है किसी के हिस्से में खार बहार कहने को कहिये मगर बहार नहीं किसी के ग़म पे किसी को खुशी का हक़ हासिल किसी को ग़म भी मनाने का अख्तियार नहीं हमें न समझो हमें देख कर न पहचानो हमारे चेहरे पे इतना अभी गुबार नहीं सुकनो–अम्नो–अमां ढूँढने कहाँ जायें जिधर भी देखिये हालात साज़गार नहीं शरीके ग़म वही अपना हुआ है ऐ सालिक कि जिसके दिल में हमारी तरह क़रार नहीं...

एक आलमे हैरत ़़़

– ग़ज़ल – एक आलमे हैरत है फ़ना है ना बक़ा है हैरत भी ये है कि क्या जानिये क्या है सौ बार जला है तो ये सौ बार बना है हम सोख्ता जानों का नशेमन भी बला है होंटों पे तबस्सुम है कि एक बर्के–बला है आँखों का इशारा है कि सैलाबे फ़ना है सुनता हूँ बड़े ग़ौर से अफ़सानए हस्ती कुछ ख्वाब है कुछ अस्ल है कुछ फर्जे अदा है है तेरे तसव्वुर से यहाँ नूर की बारिश ये जाने–हज़ीं है कि शबिस्ताने हिरा है...

ये राज़ है मेरी ़़़

– ग़ज़ल – ये राज़ है मेरी ज़िन्दगी का पहने हुए हूँ कह़न खुदी का फिर नश्तरे ग़म से छेदते हैं एक तर्ज है ये भी दिलदही का ओ लफृजो बयाँ में छुपाने वाले अब क़स्द है और खामोशी का मरना तो है इब्तदा की एक बात जीना है कमाल मुन्तही का हैं सीना गुलों की तरह कर चाक दे मर के सबूत ज़िन्दगी का...

खुदा जाने कहाँ है ़़़

– ग़ज़ल – खुदा जाने कहाँ है असगरे दीवाना बरसों से कि उसको ढँढते हैं काबा वो बुतखाना बरसों से तड़पना है न जलाना है न जलाकर खाक होना है ये क्यों सोई हुई है फितरते परवाना बरसों से कोई ऐसा नहीं या रब कि जो इस दर्द को समझे नहीं मालूम क्यों खामोश है दीवाना बरसों से हसीनों पर न रंग आया न फूलों में बहार आई नहीं आया जो लब पर नग़मए–मस्ताना बरसों से...