by Nazar | Aug 8, 2015 | Homepage
– ग़ज़ल – शाखे गुल है कि ये तलवार खिंची है यारो बाग़ में कैसी हवा आज चली है यारो कौन है खौफ़ज़दा जश्ने सहर से पूछो रात की नब्ज तो अब छूट चली है यारो ताक के दिल से दिले शीशा–ओ पैमाना तक एक एक बूँद में सौ शम्मा जी है यारो चूम लेना लबे लाली का है रिन्दों को रवा रस्म ये बादये गुल गूँ से चली है यारो सिर्फ एक गुन्चा से शर्मिन्दा है आलम की बहार दिले खूँ गश्ता के होटों पे हँसी है यारो वो जो अंगूर के खोशों में थी मानिन्दे नोजूम ढल के अब जाम में खुरशीद बनीं है यारो बू ए खूँ आती है मिलता है बहारों का सुराग़ जाने किस शोख सितमगर की गली है यारो ये ज़मीं जिससे है हम खाक नशीनों का ओरूज ये जमीं चाँद सितारों में घिरी है यारो जुर्रए तल्ख भी है जाम गवारा भी है जिन्दगी जश्न गहे बादा कशी है यारो...
by Nazar | Aug 8, 2015 | Homepage
– ग़ज़ल – हम तो खुश थे कि चलो दिल का जुनूँ कुछ कम है अब जो आराम बहुत है तो सुकूँ कुछ कम है रंगे गिरिया ने दिखाई नहीं अगली सी बहार अबके लगता है कि आमेज़िशे खूँ कुछ कम है अब तेरा हिज्र मोसलसल है तो ये भेद खुला ग़मे दिल से ग़मे दुनिया का फोसूँ कूछ कम है उसने दुख सारे ज़माने का मुझे बख्श दिया फिर भी लालच का तक़ाज़ा है काहूँ कुछ कम है राहे दुनिया से नहीं दिल की गुज़रगाह से आ फ़ासला गरचे ज़ियादा है पे यूँ कुछ कम है तुमने देखा ही नहीं मुझको भले वक्तों में ये खराबी कि मैं जिस हाल में हूँ कुछ कम है आग ही आग मेरे गर ये तन में है फ़राज़ फिर भी लगता है अभी साज़े दोरुँ कुछ कम है...
by Nazar | Aug 8, 2015 | Kamaluddin Kamal
– ग़ज़ल – किसी की याद मेरे दिल से जा नहीं सकती मेरे चिराग़ को आँधी बुझा नहीं सकती कुछ इस बला की कशिश है कि चश्मे नज्ज़ारा जमाले यार से नज़रे चुरा नहीं सकती नहीं यक़ीन तो टकरा के देख लें मौजें हमारी कश्तिये दिल डगमगा नहीं सकती संभाला है मेरे दिल ने जिसे मुहब्बत में वो बारे ग़म कभी दुनिया उठा नहीं सकती बला से क्यों न करें एतराफ़ उलफ़त का मगर निगाहे मुहब्बत छुपा नहीं सकती कमाल ऐसी मुहब्बत को दूर ही से सलाम जो मेरा साथ शबे ग़म निभा नहीं सकती...
by Nazar | Aug 8, 2015 | Kamaluddin Kamal
– ग़ज़ल – हम तेरी मुहब्बत की खातिर दुनिया को भुलाए बैठे हैं जो दिल में हमेशा जलती रहे वो शम्मा जलाए बैठे हैं जो पलकों पे जगमग करते हैं वो क़तरे नहीं हैं अश्कों के एक वादा शिकन की याद में हम कुछ फूल खिलाए बैठे हैं अब सब्रो–सुकूँ की तलखी से क्या फायदा है ए हमदरदो हम प्यार में एक हसीना के सब कुछ तो लुटाए बैठे हैं लिल्लाह इधर भी जाम बढ़ा पैहम न सही एक बार सही ऐ साक़ी तेर मैखाने में हम देर से आये बैठे हैं जब प्यार की बाते होती हैं हो जाते हो तुम क्यों चुप चुप से है बात कमाल ऐसी ही कोई जो आप छुपाए बैठे हैं...
by Nazar | Aug 8, 2015 | Nazar Maghari
गज़ल दिलबरो आओ मुझसे प्यार करो मेरे दिल को भी बेकरार करो रंग आँखों से लो गुलों से महक यूँ मुहब्बत को लालाजार करो आज की रात अपने अश्कों से मेरे दिल को न दागदार करो शेर अच्छे अगर नहीं होते अपनी आँखों को अश्कबार करो नेकियां काम आती रहती हैं नेकियां दोस्त बार बार करो मालो जर की नुमाइशें करके मत गरीबों को शर्मसार करो जब नजर तुमपे जान देता है तुम उसी पर अब एतबार करो...