क्या मिलेगा ़़़

              ग़ज़ल क्या मिलेगा कभी सोचा फलाँ में मत उलझ इस हिसाबे दोस्ताँ में खो गये किस अजब सी दास्ताँ में चल ज़रा ढँढ लायें कुछ ख़ेजाँ में गुलरुखो आ भी जाओ साथ दे दो मौसमो लाज रखना गुलसिताँ में वहशते दिल तुझे मिल जायेगा वो ढँढता रेशमी आँचल जहाँ में रहबरों में बदलने का चलन अब ज़ह्र भर दे न फिर इस जिस्मो–जाँ में खैरियत पूछते हो अब मेरी तुम लग रहा तुम भी हो अब मेह्रबाँ में जंग होगी वफ़ा के दोश पर भी दिख रहा है धुआँ दुश्मन ज़माँ में खास कुछ भी नहीं सोचो नज़र ये खास सब कुछ नजर आता गुमाँ में...

बचा के आँख ़़़

– गजल – बचा के आँख हकीकत छुपा नहीं सकती ये जुस्तजू भी अजब है बता नहीं सकती लगाओ और लगामें हमारी उल्फत पर महक जो गुल में है आँधी उड़ा नहीं सकती रहे खोलूस में जलवागरी से क्या लेना गुलों को खार की शफकत भुला नहीं सकती सितम ज़रीफ भी बोलेंगे आईना लेकर किसी की रस्मे वफा ताब ला नहीं सकती सुना दो शौक मेरा जाके अह्ले हैराँ से सितम की राह किसी दिल को भा नहीं सकती लहू के रंग की शोखी बना के दीवाना बहार कुछ भी करे फ़ैज़ उगा नहीं सकती अदावतें भी सहे रोज़ सुरखोरु हो कर नज़र को ऐसी मुहब्बत झुका नहीं सकती...

शब्द की चंचल ़़़

– हिन्दी ग़ज़ल – शब्द की चंचल धरा पर सार अलंकृत हो गये भाव विह्वल काव्य के सब घाव विस्मृत हो गये स्मरण जागा तो अवसरवाद सपने खिल उठे सार्थक रचना के सारे भाव भंगृत हो गये प्रेरणा लेकर वे पुष्पित पल्लवित जब हो गये विघ्नता के मर्म स्थल सब मयंकृत हो गये प्यार के दो शब्द अविरल भावना में क्या बहे मित्रवत संवेदना के क्षण पुरस्कृत हो गये अर्थ की दयनीय स्थिति मर्म पर बोझिल हुई मंत्रणा की भूल से उत्साह जागृत हो गये मान्यवर आक्रोश चिन्तन आच्छादित जब हुआ योनि की हुंकार से आवेश विस्तृत हो गये डूब कर हिन्दी में हम भी ऐ नज़र कुछ कह गये ये तो महिमा कंठ की है शब्द अमृत हो गये...

एक हसीं ज़ोहरा ़़़

एक हसीं ज़ोहरा जबीं फिर मुझको बहकाने लगी इश्व वो अन्दाजो ग़मज़े मुझको दिखलाने लगी दख्ल फिर देने लगी आकर मेरे हर काम में फिर ख़लल अन्दाज़ होती है मेरे आराम में फिर मुझे दिखला रही है फासले पर सब्ज़ बाग़ फिर जलाना चाहती है वो मोहब्बत का चिराग़ बे सबब फिर मेरे उपर मेह्रबां होने लगी कांटे मेरी रहगुज़ारों में वो फिर बोने लगी फिर वो आमादा हुई मुझको सताने के लिये आग रौशन कर रही है फिर जलाने के लिये डालती है हर तरफ से वो कमन्दे नाज़ फिर मुझको दिखलाने लगी वो इश्व वो अन्दाज़ फिर फिर मुझे करने लगी माएल गुनाहों की तरफ मुझको ले जाती है फिर नापाक राहों की तरफ दे रही है फिर मुझे वो दावते रंगीं फ़रेब लूट लेने पर है आमादा वो मेरा सब्रो शकेब क्या करूँ फिर कर लूँ मैं उस पर यकीनो एतबार क्या करूँ फिर कर लूँ मैं अपने जिगर को बेक़रार क्या करूँ फिर आग में मैं कूद जाउँ क्या करूँ अपनी ही गरदन पे खुद ख़न्जर चलाउँ क्या करूँ लाख वो कोशिश करे धोके में आ सकता नहीं मैं किसी को भी शरीक अपना बना सकता नहीं उससे और उसकी मोहब्बत से है अब नफ़रत मुझे मेरे दिल में कोई अरमां है न कुछ हसरत मुझे दूर रहना चाहता हूँ उस से घबराता हूँ मैं अपनी तनहाई में लुत्फे ज़िन्दगी पाता हूँ मैं चाहे जो हो जाए हर एक शै को जौहर छोड़ दूँ ग़ैर मुमकिन है कि अपने अह्द को मैं तोड़ दूँ...

मुझसे मिलने की ़़़

एक मेह्रबान खातून के ख़त के जवाब में                     –– मुझसे मिलने की ख़ुदा के लिये ज़हमत न करो ख़त भी लिखने की मेरे पास यूँ जुरअत न करो मेरी गुस्ताखि़ए तहरीर पे हैरत न करो मेरी कोताहिए दामां की शिकायत न करो कौन कहता है कि तुम मुझसे मोहब्बत न करो तुमको मालूम नहीं किस क़दर मजबूर हूँ मैं ऐशो आराम की दुनिया से बहुत दूर हूँ मैं अपने ही दिल में एक रिस्ता हुआ नासूर हूँ मैं तुम मेरे वास्ते सामाने जराहत न करो कौन कहता है कि तुम मुझसे मोहब्बत न करो मैं ज़माना की निगाहों में एक आवारा हूँ ज़िल्लत आमेज़ निगाहों का मैं गहवारा हूँ मैं समझता हूँ तुम्हारे लिये नाकारा हूँ रेत ही रेत से तामीर एमारत न करो कौन कहता है कि तुम मुझसे मोहब्बत न करो मेरी ख्वाहिश है कि नग़मा मेरा बेसाज़ रहे ज़िन्दगी का मेरी जो राज़ है वो राज़ रहे मुझको क्या चाहे कोई गोशबर आवाज़ रहे ये एनायत है जो तुम मुझपे एनायत न करो कौन कहता है कि तुम मुझसे मोहब्बत न करो मेरी तख़ईल की ज़द में भी है जन्नत लेकिन मेरी नज़रों में भी है हुस्न की अज़मत लेकिन मेरे दिल में भी है एहसासे मोहब्बत लेकिन मैं कहूँगा कि ज़माना से अदावत न करो कौन कहता है कि तुम मुझसे मोहब्बत न करो तुम कि परवरदहे अल्ताफ़ो करम हो जौहर तुम कि परदाख्तए नाज़ो नअम हो जौहर तुम कि बेगानए अन्दोहो अलम हो जौहर ग़म व अन्दोह से तब्दील मुसर्रत न करो कौन कहता है कि तुम मुझसे मोहब्बत न करो क्यों न कह दूँ...