by Nazar | Aug 9, 2015 | Arya Harish Koshalpuri
– ग़ज़ल – उदास झरना है टापू में गूँजता ही नहीं हर तरफ जुल्म का कोहरा है सूझता ही नहीं घरों में रहते हैं टूटे हुए बरतन की तरह बड़े बुजुर्गों को अब कोई पूछता ही नहीं मारे मारे यहाँ फिरते हैं इल्म के हीरे अजीब दौर है कि कोई लूटता ही नहीं निजीकरण की हवस वाली इस व्यवस्था में सिलसिला अपना गुनाहों से टूटता ही नहीं इसे मिटाने यहाँ सूरमा बहुत आये मगर बुराई का सूरज है डूबता ही नहीं...
by Nazar | Aug 9, 2015 | Arya Harish Koshalpuri, Homepage
– गीत – गीत लिखता नहीं कल के अखबार पर गिरती सरकार पर, सजते दरबार पर, गीत लिखता नहीं ……. गीत का है विषय मेरे पीड़ित मनुज स्वार्थों के लिये जिसको घेरे दनुज लेखनी है अड़ी मुक्ति के द्वार पर गीत लिखता नहीं ……. बन्दगी करते करते कमर झुक गई कर्ज चुकता नहीं जिन्दगी चुक गई फिक्र है आजकल घिरती दीवार पर गीत लिखता नहीं ……. जाति भाषा में जो बाँटते आदमी आज भी ऐसे जन की नहीं है कमी फिरके फिरके में बँटते हुए प्यार पर गीत लिखता नहीं ……. पूर्ण मुक्ति के रण जो खड़े एक क्षण आज उनकी शरण बढ़ रहे हैं चरण अब भरोसा नहीं छलते पतवार पर गीत लिखता नहीं ……. गीत लिखता नहीं कल के अखबार पर गिरती सरकार पर, सजते दरबार पर...
by Nazar | Aug 9, 2015 | Arya Harish Koshalpuri
– गीत – बहुरे दिन चैतू चमार के हर पल सिंगार के बहुरे दिन —– खड़ी दोपहरी में पाँवों की चटपट माथे पे घानी के तेलों की करवट तरकुल की खोर धरे टयराही चट्टी खोल रही तन्त्री की हर पोल पट्टी गुरखुल से पाँव छतनार के बहुरे दिन —– झोरे की गुरधनिया नैहर से सासुर टहल घूम चींटी गपकती थी पाहुर कांधे कमीज रही यात्रा की सहचर केवल सिवाने पे चढ़ती थी तनकर नखरे दिखाती थी हाथी सवार के बहुरे दिन —– चार दिन चन्दा चन्दनियाँ के सपने छोड़ दिये झूठे सुख मूल रण अपने अपने ही जीवन में सुख की परछाईं छूने की आस चढ़ी छोड़ी लड़ाई कर दिये हस्ताक्षर सुधार के बहुरे दिन —– आधी अधूरी आजादी के टोटके लील गई पोथी गुलामी के झटके बीत गये रीत गये आये दिन अच्छे अब न रिरियाएंगे ये मेरे बच्चे दादी की आँख दिखे सपने उधार के बहुरे दिन —– ...
by Nazar | Aug 9, 2015 | Arya Harish Koshalpuri
– गीत – गाँव से शहर तक लोग फैले पन्थ मजहब की दूकान लेके कोई गीता का उपदेश लेकर कोई हाथों में कुरआन लेके गाँव से शहर तक —– ढेरों हिन्दू मुसलमाँ मिले हैं एक इन्सान का रूप ढाले एक इन्सान मैं ढूँढता हूँ कुछ मनुजता की पहचान लेके गाँव से शहर तक —– जितना ज्यादा दवा की गई रोग उतना ही बढ़ता गया सबके सब राय देने लगे अपने खेमे का विद्वान लेके गाँव से शहर तक —– सच को लिखने से कतरा गई लेखनी जिस कलम ने लिखा वह कलम हो गई फूल खुशबू पे कविताएं लिखकर बैठे हैं कवि की पहचान लेके गाँव से शहर तक —– मैं ये कहता नहीं कि विषय छोड़ दो किन्तु कुछ तो लिखो बिगड़े परिवेश पे वक्त के एक तुम्हीं ही कलमकार हो बैठे हो क्यों कलमदान लेके गाँव से शहर तक —– जल रहा रोम नीरो न बन्सी बजा बन्सी वाले ने ही चक्र दौड़ाया था कितने पल जी सकोगे बताओ बेवजह का ये अपमान लेके गाँव से शहर तक —– तस्करी हो रही जग में इन्सान की सरफिरों ने घुमाए हैं सर इस तरह गर्व से घमते हैं चमन में आदमीयत का उनवान लेके गाँव से शहर तक —– जाति मजहब औ पंथाई झगड़े इनसे ऊपर उठो तो बतायें शहरों शहरों तुम्हें ढूँढते हैं नूर फेराक रसखान लेके गाँव से शहर तक —–...