by Nazar | Aug 9, 2015 | Shashi Bhushan 'Shashi'
– गीत – पीर उर की कण्ठ में आ राग कैसे बन गई है पीर उर की कण्ठ में —– यह वहीं राकेश विरहिन ताप जो बढ़ कर बढ़ाता सिन्धु क्यों इसके चरण पर झूम श्रद्धान्जलि चढ़ाता आह इसकी शीतता अनुराग कैसे बन गई है पीर उर की कण्ठ में —– प्रिय वियोग विदग्ध रंगिनि आत्म विस्मृति ढो रही है पीर को उर में समेटे आज सन्ध्या सो रही है वेदना इसकी अखण्ड सुहाग कैसे बन गई है पीर उर की कण्ठ में —– वही जो मानव हृदय में चिर पिपासा बीज बोए तृप्ति की आशा लिये तड़पन अपरिमित जो संजोये रागिनी करुणा प्रपूरित फाग कैसे बन गई है पीर उर की कण्ठ में —– ठोकरें खा कर जगत की प्यार जिसका पल न पाया जो कि झंझा में गिरा पर दीनहीन संभल न पाया वह पलायन वृत्ति बोल विराग कैसे बन गई है पीर उर की कण्ठ में —– ...
by Nazar | Aug 9, 2015 | Shashi Bhushan 'Shashi'
– गीत – देवि वर दे बढ़ सकूँ मैं श्रीचरण में स्थान पाऊँ देवि वर दे —– देखता हूँ अमल अनुपम भाव का गुम्फन सुहाना पा सुरभिमय सुमन डाली समुदमातः मुस्कुराना आ गया हूँ द्वार तक पर शिथिल हूँ क्या लौट जाऊँ देवि वर दे —– लख प्रवाहित धार रस की शुष्क मानस तिलमिलाता अर्चना के सुमन धूमिल पग स्वयं ही ठमक जाता रुक विवशते उग्र मत हो भगवती से पूछ आऊँ देवि वर दे —– देवि बेमांगी दया से किसी को कवि गुरु बनाया सुन विरुद् तेरा पुजारी दूर से कुछ फूल लाया जा करे स्वीकार तो मैं भी सफल जीवन बनाऊँ देवि वर दे —–...
by Nazar | Aug 9, 2015 | Baledeen Besahara
– गीत – मरेंगे आन पर सदा स्वदेश के लिये सौ बार जन्म लेंगे अपने देश के लिये सौ बार जन्म लेंगे —– जिस देश में बहती है गंगा–यमुना की धारा जिस देश में लहराता है सागर का किनारा करते नमन हिमालयी परिवेश के लिये सौ बार जन्म लेंगे —– पैदा थे जहाँ राम–कृष्ण, गौतम और गाँधी ऊधम, भगत, शेखर चलाये क्रान्ति की आँधी हम भी मिटेंगे जननी के क्लेश के लिये सौ बार जन्म लेंगे —– हिन्दू मुसलमाँ सिक्ख औ ईसाई है यहाँ हर धर्म के अनुयायी भाई–भाई हैं यहाँ कटिबद्ध हैं हम ऐसे ही उपदेश के लिय सौ बार जन्म लेंगे —– हम हैं अनेक फिर भी सदा नेक रहेंगे हम एक थे हम एक हैं हम एक रहेंगे बलिदान बालेदीन का अवशेष के लिये सौ बार जन्म लेंगे —–...
by Nazar | Aug 9, 2015 | Baledeen Besahara
– ग़ज़ल – दूसरों के कहने पर आग जो लगाएंगे उनका आशियां भी है यहीं कैसे वो बचाएंगे अपनी माँ के आँचल को तार–तार कर रहे जो गर वजूद इसका मिट गया सर कहाँ छुपाएंगे मजहब औ जात–पात से खत्म जो मुहब्बतें हुईं इनको नफरतों का काफिला आप क्या बनाएंगे अपना चेहरा यूँ बिगाड़ना है नहीं उचित ऐ दोस्तों आइना जो सामने पड़ा कैसे मुँह दिखाएंगे बात है समझने की बालेदीन भूलना नहीं प्रेम से जिसे न पा सके बैर से क्या पाएंगे...
by Nazar | Aug 9, 2015 | Baledeen Besahara
– ग़ज़ल – जाने कि कैसे सपने सजाने लगे हैं लोग फूलों की जगह शूल ही बोने लगे हैं लोग आज अपना वो गौरवमयी इतिहास भूलकर पाश्चात्य सभ्यता में गुम होने लगे हैं लोग मतलब परस्त लोगों की हिम्मत तो देखिये लाकर किनारे नाव डुबोने लगे हैं लोग अपने ही हाथों अपना अस्तित्व बेच कर दिल रो रहा चेहरे से खुश होने लगे हैं लोग जबरन जला के अपनी बहुओं को आज कल घड़ियाली रुलाई यहाँ रोने लगे हैं लोग सदभाव शान्ति सत्य अहिंसा को छोड़ कर बालेदीन अपने खूँ से भिगोने लगे हैं लोग...