सोच सको तो ़़़

– कविता – सोच सको तो सोचो साम्प्रदायिकता के फैलते हुए जहर पर आतंकवाद के बढ़ते हुए कहर पर जातिवाद की ऊँची उठती हुई लहर पर और प्रदूषण से युक्त अपने शहर पर सोच सको तो सोचो दहेज की आग में जलती हुई बेटियों पर पसीने से भीगी हुई गरीब की रोटियों पर शोषण करने वालों की गगनचुम्बी कोठियों पर और उसी के बगल में दुर्गन्ध युक्त बस्तियों पर सोच सको तो सोचो भूख से तिलमिलाती हुई तरुणाई पर सुरसा के मुँह की तरह बढ़ती हुई मँहगाई पर हिन्दू मुसलमान सिक्ख ईसाई पर और उनके बीच बढ़ती हुई नफरत की खाई पर सोच सको तो सोचो गिरगिट की तरह रंग बदलते हुए इन्सान पर सिर्फ पैसों के लिये बिकते हुए ईमान पर वर्तमान दौर के परमाणविक अनुसन्धान पर और इन्हीं सबके बीच अपने प्यारे हिन्दुस्तान पर सोच सको तो सोचो...

पत्थर चला के ़़़

– ग़ज़ल – पत्थर चलाके शीशए दिल तोड़ दिया है पल भर में ज़िन्दगी को अलग मोड़ दिया है चलने की क़सम खाई थी ता उम्र साथ–साथ दो पग भी चल न पाया पीछे छोड़ दिया है जिन आँखों में तस्वीर थी उनकी बसी हुई उन आँखों को नश्तर चुभा के फोड़ दिया है जिस दिल में लहू दौड़ता था उनके प्यार का मुट्ठी में भींच भींच के निचोड़ दिया है जब सजदा कर रहा था देवता के दर मैं पीछे से वो गर्दन मेरा मरोड़ दिया है किससे करुँ मैं अर्ज औ शिकवा करुँ किससे जब अपने ही साये ने साथ छोड़ दिया है...

परेशान पति ने ़़़

परेशान पति ने पत्नी से कहा – एक मैं हूं जो तुम्हें निभा रहा हूँ लेकिन अब, पानी सर से ऊपर जा चुका है इस लिये आत्म-हत्या करने जा रहा हूँ पत्नी बोली – ठीक है, लेकिन हमेशा की तरह आज मत भूल जाना, और लौटते समय दो किलो आटा जरूर लेते आना...

पत्नी ने पति से ़़़

पत्नी ने पति से कहा — तुम रोज-रोज नदी में छलांग लगाने की कहते हो लेकिन आज तक तुमने छलांग लगाई पति बोला — चेलैंज मत कर वरना करके दिखा दूंगा, अभी मैं तैरना सीख रहा हूँ जिस दिन आ जाएगा छलांग भी लगा दूंगा पति बोला — अगर तू इतनी ही परेशान है तो मुझे छोड़ क्यों नहीं देती, ये पति-पत्नी का रिश्ता तोड़ क्यों नही देती पत्नी बोली — इतनी जल्दी भी क्या है मेरे साजन भोले, पहले तेरी सारी संपत्ति मेरे नाम तो हो ले पत्नी ने सुबह-सुबह पति को जगाया पति बड़बड़ाया – दो मिनट बाद नहीं जगा सकती थी ऐसी भी क्या जल्दी थी कितना अच्छा सपना दिख रहा था, राजा हरिस्चन्द्र बना मैं और मेरा परिवार चौराहे पर बिक रह था पत्नी बोली — फिर, दो मिनट में वहां कौनसी तुम्हारे लिए रोटी सिक लेती, वह बोला — बेवकूफ, रोटी सिकती या न सिकती पर दो मिनट में कम से कम तू तो बिक लेती...

किसी जानिब कलम उट्ठे ़़़

– ग़ज़ल – किसी जानिब क़लम उट्ठे कोई मौजू नहीं देते लहरते बेहया के फूल हैं खुशबू नहीं देते तिजोरी भर के रखते हैं सदा अपनों की खातिर ये ग़रीबी दूर हो जिससे वही साहू नहीं देते हमारी बात पर विश्वास ना हो आजमा लेना यहाँ शैतान सब देता है जो साधू नहीं देते अलग है प्यार करने का तरीका आज भी अपना खुशी देते हैं हम जिसको उसे आँसू नहीं देते हम ऐसे ज्योतिषी हैं काट देते ग्रह दशाओं को किसी की ज़िन्दगी में राहु वो केतू नहीं देते...