अगर चाहते हो ़़़

– ग़ज़ल – अगर चाहते हो तबाही से बचना तो सरकार की सुर्ख स्याही से बचना कहीं डाकुओं से अगर बच गये भी है मुश्किल बहुत एक सिपाही से बचना यहाँ न्याय बहरा है कानून अन्धा हरिश्चन्द की हर गवाही से बचना मुहब्बत की राहों में धोखे बहुत हैं सदा एक अन्जान राही से बचना चढ़ा कर तुम्हें खींच लेंगे किसी दिन ये वो दोस्त हैं वाह–वाही से बचना...

उठता शोर ़़़

– ग़ज़ल – उठता शोर संभालो यारों घर का चोर संभालो यारों लूट न लें रजनी से पहले सुरभित भोर संभालो यारों बे मौसम जो नाच रहा है नकली मोर संभालो यारों प्यास कुएँ से बुझ जायेगी उलझी डोर संभालो यारों इस सीमा से उस सीमा तक कोई छोर संभालो यारों...

जश्ने आज़ादी मनाई ़़़

– ग़ज़ल – जश्ने आज़ादी मनाई जा रही है अम्न की बंसी बजाई जा रही है भाषणों में हैं भगतसिंह आज भी फस्ल जयचन्दी उगाई जा रही है हर तरफ इन्साफ के मुन्सिफ हैं पर बे ख़ता फाँसी सुनाई जा रही है जल समस्या पर बहस हाथों में रम काग़ज़ी गंगा बहाई जा रही है एक टूटी ही नहीं कि दूसरी पाँव की बेड़ी बनाई जा रही है...

दुश्मन को मेहमान ़़़

– ग़ज़ल – दुश्मन को मेहमान बनाया पत्थर को भगवान बनाया मेरे दिल का हाल न पूछो सारिक को सुल्तान बनाया खुद को रोटी की चाहत में साधू से शैतान बनाया दौरे सियासत का क्या कहना कुफ्र को ही फरमान बनाया इस दुश्वारी के आलम में क्यों मुझको इन्सान बनाया...

उदास झरना है ़़़

– ग़ज़ल – उदास झरना है टापू में गूँजता ही नहीं हर तरफ जुल्म का कोहरा है सूझता ही नहीं घरों में रहते हैं टूटे हुए बरतन की तरह बड़े बुजुर्गों को अब कोई पूछता ही नहीं मारे मारे यहाँ फिरते हैं इल्म के हीरे अजीब दौर है कि कोई लूटता ही नहीं निजीकरण की हवस वाली इस व्यवस्था में सिलसिला अपना गुनाहों से टूटता ही नहीं इसे मिटाने यहाँ सूरमा बहुत आये मगर बुराई का सूरज है डूबता ही नहीं...