गीत लिखता नहीं ़़़

– गीत – गीत लिखता नहीं कल के अखबार पर गिरती सरकार पर, सजते दरबार पर, गीत लिखता नहीं ……. गीत का है विषय मेरे पीड़ित मनुज स्वार्थों के लिये जिसको घेरे दनुज लेखनी है अड़ी मुक्ति के द्वार पर गीत लिखता नहीं ……. बन्दगी करते करते कमर झुक गई कर्ज चुकता नहीं जिन्दगी चुक गई फिक्र है आजकल घिरती दीवार पर गीत लिखता नहीं ……. जाति भाषा में जो बाँटते आदमी आज भी ऐसे जन की नहीं है कमी फिरके फिरके में बँटते हुए प्यार पर गीत लिखता नहीं ……. पूर्ण मुक्ति के रण जो खड़े एक क्षण आज उनकी शरण बढ़ रहे हैं चरण अब भरोसा नहीं छलते पतवार पर गीत लिखता नहीं ……. गीत लिखता नहीं कल के अखबार पर गिरती सरकार पर, सजते दरबार पर...

बहुरे दिन चैतू ़़़

– गीत – बहुरे दिन चैतू चमार के हर पल सिंगार के बहुरे दिन —– खड़ी दोपहरी में पाँवों की चटपट माथे पे घानी के तेलों की करवट तरकुल की खोर धरे टयराही चट्टी खोल रही तन्त्री की हर पोल पट्टी गुरखुल से पाँव छतनार के बहुरे दिन —– झोरे की गुरधनिया नैहर से सासुर टहल घूम चींटी गपकती थी पाहुर कांधे कमीज रही यात्रा की सहचर केवल सिवाने पे चढ़ती थी तनकर नखरे दिखाती थी हाथी सवार के बहुरे दिन —– चार दिन चन्दा चन्दनियाँ के सपने छोड़ दिये झूठे सुख मूल रण अपने अपने ही जीवन में सुख की परछाईं छूने की आस चढ़ी छोड़ी लड़ाई कर दिये हस्ताक्षर सुधार के बहुरे दिन —– आधी अधूरी आजादी के टोटके लील गई पोथी गुलामी के झटके बीत गये रीत गये आये दिन अच्छे अब न रिरियाएंगे ये मेरे बच्चे दादी की आँख दिखे सपने उधार के बहुरे दिन —–                     ...

गाँव से शहर तक ़़़

– गीत – गाँव से शहर तक लोग फैले पन्थ मजहब की दूकान लेके कोई गीता का उपदेश लेकर कोई हाथों में कुरआन लेके गाँव से शहर तक —– ढेरों हिन्दू मुसलमाँ मिले हैं एक इन्सान का रूप ढाले एक इन्सान मैं ढूँढता हूँ कुछ मनुजता की पहचान लेके गाँव से शहर तक —– जितना ज्यादा दवा की गई रोग उतना ही बढ़ता गया सबके सब राय देने लगे अपने खेमे का विद्वान लेके गाँव से शहर तक —– सच को लिखने से कतरा गई लेखनी जिस कलम ने लिखा वह कलम हो गई फूल खुशबू पे कविताएं लिखकर बैठे हैं कवि की पहचान लेके गाँव से शहर तक —– मैं ये कहता नहीं कि विषय छोड़ दो किन्तु कुछ तो लिखो बिगड़े परिवेश पे वक्त के एक तुम्हीं ही कलमकार हो बैठे हो क्यों कलमदान लेके गाँव से शहर तक —– जल रहा रोम नीरो न बन्सी बजा बन्सी वाले ने ही चक्र दौड़ाया था कितने पल जी सकोगे बताओ बेवजह का ये अपमान लेके गाँव से शहर तक —– तस्करी हो रही जग में इन्सान की सरफिरों ने घुमाए हैं सर इस तरह गर्व से घमते हैं चमन में आदमीयत का उनवान लेके गाँव से शहर तक —– जाति मजहब औ पंथाई झगड़े इनसे ऊपर उठो तो बतायें शहरों शहरों तुम्हें ढूँढते हैं नूर फेराक रसखान लेके गाँव से शहर तक —–...

जो ठोकर में बढ़ा करते ़़़

– गीत – जो ठोकर में बढ़ा करते वही इतिहास गढ़ते हैं जो सूली पर चढ़ा करते वही इतिहास गढ़ते हैं जो ठोकर में बढ़ा करते —- जो तप कर आग में कुन्दन, जो घिस कर बाद में चन्दन, जो आनों पर अड़ा करते वही इतिहास गढ़ते हैं जो ठोकर में बढ़ा करते —- लीक से हट के चलते, शिवा से डट के चलते, जो निर्बल को खड़ा करते वही इतिहास गढ़ते हैं जो ठोकर में बढ़ा करते —- जो दलितों पीड़ितों के हित, करें आलस्य न किंचित, मुकुट माथे मढ़ा करते वही इतिहास गढ़ते हैं जो ठोकर में बढ़ा करते —- जो सबकी मुक्ति में ही सुख, उठाते रहते हैं नित दुख, जो मंसूबे गढ़ा करते वही इतिहास गढ़ते हैं जो ठोकर में बढ़ा करते —-...

भारत की ऐ सुघर बेटियों ़़़

– गीत – भारत की ऐ सुघर बेटियों हमको तुम पर गर्व है एक तुम्हारे होने से ही घर दीवाली पर्व है भारत की ऐ सुघर बेटियों —– तुम्ही कल्पना तुम्ही अरुणिमा, तुम्ही शैव्या तुम्ही लक्षमा, तुम्ही बुलन्दी छूने वाली, प्यार बीज का बोने वाली, हर सपने साकार करे तू कभी नहीं इनकार करे तू लाखों पुत्रों पर तू भारी एक अकेली खर्व है भारत की ऐ सुघर बेटियों —– राजनीति में ऊँचा परचम, जैसे हो तारों में अनुपम झॉसी की रानी बन बन कर, आती रही धरा पर तन कर सीता अनसुइया की बेटी, भारत के भावों में लेटी सूखा को सावन कर डाले तुमसे ही तो सर्व है भारत की ऐ सुघर बेटियों —–...