by Nazar | Aug 8, 2015 | Niyaz Azmi
– ग़ज़ल – एहसास न मर जाये कहीं क़ल्बो जिगर में है रूह भी दरकार बहुत इल्मो हुनर में बे खौफो ख़तर होके निकलना नहीं अच्छा शीशे का बदन लेके चटानों के नगर में एक पल में बदल देती है इन्सान की नीयत तासीर हुआ करती है कुछ ऐसी नज़र में पर्दे में ही हो सकती है अस्मत की हिफ़ाज़त बे पर्दा न लुट जाये कहीं राह गुज़र में आसान नहीं होती है ये राहे मुहब्बत रहज़न भी मिला करते हैं उल्फ़त की डगर में गुलशन में न्याज़ अपना क़दम रखना संभल के काँटे भी हुआ करते हैं फूलों के शजर में...
by Nazar | Aug 8, 2015 | Shafi Anwar
– अखलास के गुलाब – राहे वफ़ा में शम्मा जलाते रहेंगे हम नफ़रत की तीरगी को मिटाते रहेंगे हम दीवार जुमल्मो-जौर की ढाते रहेंगे हम अम्नो-अमाँ का ताज बनाते रहेंगे हम बातिल हमारी राह में हाएल हुआ करे सर अपना राहे हक़ में कटाते रहेंगे हम झोंके हज़ार जुल्मो-सितम के चला करें अखलास के गुलाब खिलाते रहेंगे हम दीवार ज़ुल्मतों की खड़ी है तो क्या हुआ अनवर क़दम को आगे बढ़ाते रहेंगे हम...
by Nazar | Aug 8, 2015 | Shafi Anwar
– नज़्म : मजलिसे अक़वाम – है उन्हीं मुल्कों का क़ब्ज़ा मजलिसे अक़वाम पर जिनके हाथों में हैं मोहलिक असलहे और मालो-ज़र और मेम्बर तो फ़क़त हैं इस इदारे के गुलाम जक़्स करते हैं इशारे पर उन्हीं के सुब्हो शाम कौन कहता है ये अम्नो-आश्ती का बाग़ है अस्ल में ये दामने-इनसानियत पर दाग़ है ज़ुल्म की ताईद है इसका ओसूले जिन्दगी है मसावातो-अखूवत इसके आगे दिल्लगी हो रहे हैं नातवाँ शहज़ोर के आगे ज़लील कर रहे हैं नातवाँ मुल्कों पे हमले बे दलील ज़अफ़ ईमां का मुसलमाँ हो गया है यूँ शिकार हो रहा है इस जगत में इसलिये रुसवा-वो-ख्वार है नहीं इस्लामियों का कोई अनवर खैर-ख्वाह चाहते हैं सब यही कि क़ौम मुस्लिम हो तबाह...
by Nazar | Aug 8, 2015 | Shafi Anwar
– नज्म – हिन्द में सब हो गये हैं अब तअस्सुब के शिकार दामने जमहूर गुलशन हो गया है तार तार आज भारत के मुसलमाँ का न पूछो हाल ज़ार हैं बड़े मजबूरो–बेकस कसमपुर्सी के शिकार मरहबा तनहाई मेरी आज रौशन हो गई सुब्ह का पैग़ाम लेकर आई शामे इन्तज़ार क़ौमी एकजेहती का नारा किस तरह हो कामयाब बह रहा है जबकि चारों सिम्त बहरे इन्तशार क़ौम से इतना ही मतलब रहबराने क़ौम को चाहते हैं गुल्सिताँ पर अपना अपना एक़तेदार जिस्म का साया भी मुझको अजनबी दिखलाई दे राज़ी रोटी छ्िन गई है छ्िन गया है रोज़गार कौन है जिसने मेरी सारी मसर्रत छीन ली कौन है जो दिल को रखता है हमेशा बेक़रार जिन्दगी के बाग़ में क्या मुस्कराएं गे गुलाब पाँव से लिपटी है मेरे गर्दिशे लैलो नहार मैं तेरा बन्दा हूँ मुझ पर रहम कर परवर दिगार अपने अनवर को न करना हश्र में रुसवा व ख्वार...
by Nazar | Aug 8, 2015 | Safvi Barabankavi
– नात शरीफ़ – निगाह हक़ से वाबस्ता है मैखाना मुहम्मद का जो दीवाना खुदा का है वो दीवाना मुहम्मद का जिसे जन्नत से तश्बीह देना ग़ैर मुमकिन है मदीने की हैं वो गलियाँ वो काशाना मुहम्मद का रहे गा हश्र तक वो बेनेयाज़ कौसरो–ज़मज़म अज़ल से पी के आया है जो पैमाना मुहम्मद का जिसे देखा वो बीमारे मुहब्बत हो गया उनका बेहम्दुल्लाह अन्दाज़े तैबाना मुहम्मद का फ़क़ीरों को भी मिलती है शहिन्शाही यहाँ सफ़वी ये वो दरबार है दरबारे शाहाना मुहम्मद का (मौरखा 19 दिसम्बर 1958)...