शिकवए तन्ज़ीमे गुलशन ़़़

– ग़ज़ल – शिकवए तन्ज़ीमे गुलशन क्या करें गुल्सिताँ वालों से अनबन क्या करें हमको दुनिया छोड़ने का ग़म नहीं छुट रहा है तेरा दामन क्या करें ज़ुल्फे शब गों के तसव्वर से भी अब बढ़ रही है दिल की उलझन क्या करें या एलाही खातमा बिलखैर हो जी के अब दुनिया को बदज़न क्या करें शौक है मन्जि़ल का ऐ सफ़वी मगर राहबर भी अब है रहज़न क्या करें (02-01-1959)...

न रो ऐ दिल कहीं ़़़

– ग़ज़ल – न रो ऐ दिल कहीं रोने से तक़दीरें बदलती हैं ज़ियाए रंगो रोग़न से ये तस्वीरें बदलती हैं तुम्हीं ने प्यार बखशा था तुम्हीं ने फेर ली आँखें बहर सूरत मेरे ख्वाबों की ताबीरें बदलती हैं असर अन्दाज़ तो ऐ गर्दिशे अइयाम क्या होगी कहीं तदबीर से क़िस्मत की तहरीरें बदलती हैं न पूछो अहले गुलशन से कि आकर सेहने गुलशन में बदल जाते हैं दीवाने कि ज़नजीरें बदलती हैं मुहब्बत में एक ऐसा वक़्त भी आता है ऐ सफ़वी कि अज़खुद नारसा आहों की तासीरें बदलती हैं (31 दिसम्बर 1959)...

जिस जुबाँ पे न हो ़़़

              – गजल – जिस जुबां पे न हो जिक्र तेरा सनम उस जुबां में लहू आदमी का नही प्यार की तेरे जिस दिल में खुशबू न हो दिल वो पत्थर है पत्थर महकता नही बज्मे शादाब से उठके तुम क्या गये बज्मे शादाब में खामुशी हो गयी कोई पायल वहॉ आज बजती नही कोई कंगन वहॉ अब खनकता नही गेसुओं वाले जब तक तेरा साथ था मेरे एहसास में धूप भी छॉव थी साथ छूटा तेरा तो गजब हो गया कोई साया मेरे हक में साया नही फूल मुरझा गया तो खिलेगा कहॉ और दिल टूटा तो फिर मिलेगा कहॉ दिल को मेरे न इतना उछाला करो दिल है प्यारे ये कोई खिलौना नही बात गुलशन के फूलों से मैं क्या; करूं बात तुझसे जो होती तो कुछ बात थी चॉद तारे मुझे खुशनुमा क्यूं लगें सामने जब मेरे तेरा चेहरा  नही मैने जाना तुझे मैने माना तुझे तू मुझे जान ले तू मुझे मान ले लग्जिशों पे न आ अपने घायल के तूं तेरा घायल है इंसा फरिश्ता  नही               ...

आज ज़िन्दगी अपनी ़़़

– ग़ज़ल – आज जिन्दगी अपनी उलझनों मे कटती है रात भर ये तनहाई सॉप बनके डसती है कौन सुनने वाला है गम की दास्तॉ अपनी आजकल जमाने में आप ही कि चलती है कोई तो बता दे ये है कहॉ मेरा हमदम बार बार मिलने की आरजू मचलती है मैं तो उस पे हर लम्हा जॉनिसार करता था फिर वो बेवफा ऐसी रास्ता बदलती है दफ्न करके जब मैयत मेरी जा चुके घायल तब वो कब्र पे मेरी आके हाथ मलती है                 ...

तुम ग़रीबों को ़़़

– ग़ज़ल – तुम गरीबों को अपना बनाते चलो प्यार के फूल हरसू खिलाते चलो राह पर खार है तुम न कुछ गम करो कारवॉ अपना आगे बढाते चलो चाहते हो भलाई कुछ अपनी अगर हॉ कदम से कदम तुम मिलाते चलो साफगोई से हरगिज न मुंह मोड़ना हक पसन्दी का नारा लगाते चलो वक्त के उन अंधेरों में अय दोस्तों तुम चरागे मुहब्बत जलाते चलो कर दिया वक्त ने दिल को घायल मगर हौसला और हिम्मत बंधाते चलो               ...

एक आलमे हैरत ़़़

– ग़ज़ल – एक आलमे हैरत है फ़ना है ना बक़ा है हैरत भी ये है कि क्या जानिये क्या है सौ बार जला है तो ये सौ बार बना है हम सोख्ता जानों का नशेमन भी बला है होंटों पे तबस्सुम है कि एक बर्के–बला है आँखों का इशारा है कि सैलाबे फ़ना है सुनता हूँ बड़े ग़ौर से अफ़सानए हस्ती कुछ ख्वाब है कुछ अस्ल है कुछ फर्जे अदा है है तेरे तसव्वुर से यहाँ नूर की बारिश ये जाने–हज़ीं है कि शबिस्ताने हिरा है...