by Nazar | Aug 8, 2015 | Asghar Gondavi
– ग़ज़ल – ये राज़ है मेरी ज़िन्दगी का पहने हुए हूँ कह़न खुदी का फिर नश्तरे ग़म से छेदते हैं एक तर्ज है ये भी दिलदही का ओ लफृजो बयाँ में छुपाने वाले अब क़स्द है और खामोशी का मरना तो है इब्तदा की एक बात जीना है कमाल मुन्तही का हैं सीना गुलों की तरह कर चाक दे मर के सबूत ज़िन्दगी का...
by Nazar | Aug 8, 2015 | Asghar Gondavi
– ग़ज़ल – खुदा जाने कहाँ है असगरे दीवाना बरसों से कि उसको ढँढते हैं काबा वो बुतखाना बरसों से तड़पना है न जलाना है न जलाकर खाक होना है ये क्यों सोई हुई है फितरते परवाना बरसों से कोई ऐसा नहीं या रब कि जो इस दर्द को समझे नहीं मालूम क्यों खामोश है दीवाना बरसों से हसीनों पर न रंग आया न फूलों में बहार आई नहीं आया जो लब पर नग़मए–मस्ताना बरसों से...
by Nazar | Aug 8, 2015 | Kamaluddin Kamal
– ग़ज़ल – किसी की याद मेरे दिल से जा नहीं सकती मेरे चिराग़ को आँधी बुझा नहीं सकती कुछ इस बला की कशिश है कि चश्मे नज्ज़ारा जमाले यार से नज़रे चुरा नहीं सकती नहीं यक़ीन तो टकरा के देख लें मौजें हमारी कश्तिये दिल डगमगा नहीं सकती संभाला है मेरे दिल ने जिसे मुहब्बत में वो बारे ग़म कभी दुनिया उठा नहीं सकती बला से क्यों न करें एतराफ़ उलफ़त का मगर निगाहे मुहब्बत छुपा नहीं सकती कमाल ऐसी मुहब्बत को दूर ही से सलाम जो मेरा साथ शबे ग़म निभा नहीं सकती...
by Nazar | Aug 8, 2015 | Kamaluddin Kamal
– ग़ज़ल – हम तेरी मुहब्बत की खातिर दुनिया को भुलाए बैठे हैं जो दिल में हमेशा जलती रहे वो शम्मा जलाए बैठे हैं जो पलकों पे जगमग करते हैं वो क़तरे नहीं हैं अश्कों के एक वादा शिकन की याद में हम कुछ फूल खिलाए बैठे हैं अब सब्रो–सुकूँ की तलखी से क्या फायदा है ए हमदरदो हम प्यार में एक हसीना के सब कुछ तो लुटाए बैठे हैं लिल्लाह इधर भी जाम बढ़ा पैहम न सही एक बार सही ऐ साक़ी तेर मैखाने में हम देर से आये बैठे हैं जब प्यार की बाते होती हैं हो जाते हो तुम क्यों चुप चुप से है बात कमाल ऐसी ही कोई जो आप छुपाए बैठे हैं...
by Nazar | Aug 8, 2015 | Nazar Maghari
गज़ल दिलबरो आओ मुझसे प्यार करो मेरे दिल को भी बेकरार करो रंग आँखों से लो गुलों से महक यूँ मुहब्बत को लालाजार करो आज की रात अपने अश्कों से मेरे दिल को न दागदार करो शेर अच्छे अगर नहीं होते अपनी आँखों को अश्कबार करो नेकियां काम आती रहती हैं नेकियां दोस्त बार बार करो मालो जर की नुमाइशें करके मत गरीबों को शर्मसार करो जब नजर तुमपे जान देता है तुम उसी पर अब एतबार करो...
by Nazar | Aug 8, 2015 | Nazar Maghari
ग़ज़ल क्या मिलेगा कभी सोचा फलाँ में मत उलझ इस हिसाबे दोस्ताँ में खो गये किस अजब सी दास्ताँ में चल ज़रा ढँढ लायें कुछ ख़ेजाँ में गुलरुखो आ भी जाओ साथ दे दो मौसमो लाज रखना गुलसिताँ में वहशते दिल तुझे मिल जायेगा वो ढँढता रेशमी आँचल जहाँ में रहबरों में बदलने का चलन अब ज़ह्र भर दे न फिर इस जिस्मो–जाँ में खैरियत पूछते हो अब मेरी तुम लग रहा तुम भी हो अब मेह्रबाँ में जंग होगी वफ़ा के दोश पर भी दिख रहा है धुआँ दुश्मन ज़माँ में खास कुछ भी नहीं सोचो नज़र ये खास सब कुछ नजर आता गुमाँ में...