राहे वफ़ा में ़़़

– अखलास के गुलाब – राहे वफ़ा में शम्मा जलाते रहेंगे हम नफ़रत की तीरगी को मिटाते रहेंगे हम दीवार जुमल्मो-जौर की ढाते रहेंगे हम अम्नो-अमाँ का ताज बनाते रहेंगे हम बातिल हमारी राह में हाएल हुआ करे सर अपना राहे हक़ में कटाते रहेंगे हम झोंके हज़ार जुल्मो-सितम के चला करें अखलास के गुलाब खिलाते रहेंगे हम दीवार ज़ुल्मतों की खड़ी है तो क्या हुआ अनवर क़दम को आगे बढ़ाते रहेंगे हम...

है उन्हीं मुल्कों का ़़़

– नज़्म : मजलिसे अक़वाम – है उन्हीं मुल्कों का क़ब्ज़ा मजलिसे अक़वाम पर जिनके हाथों में हैं मोहलिक असलहे और मालो-ज़र और मेम्बर तो फ़क़त हैं इस इदारे के गुलाम जक़्स करते हैं इशारे पर उन्हीं के सुब्हो शाम कौन कहता है ये अम्नो-आश्ती का बाग़ है अस्ल में ये दामने-इनसानियत पर दाग़ है ज़ुल्म की ताईद है इसका ओसूले जिन्दगी है मसावातो-अखूवत इसके आगे दिल्लगी हो रहे हैं नातवाँ शहज़ोर के आगे ज़लील कर रहे हैं नातवाँ मुल्कों पे हमले बे दलील ज़अफ़ ईमां का मुसलमाँ हो गया है यूँ शिकार हो रहा है इस जगत में इसलिये रुसवा-वो-ख्वार है नहीं इस्लामियों का कोई अनवर खैर-ख्वाह चाहते हैं सब यही कि क़ौम मुस्लिम हो तबाह...

हिन्द में सब हो गये ़़़

– नज्म – हिन्द में सब हो गये हैं अब तअस्सुब के शिकार दामने जमहूर गुलशन हो गया है तार तार आज भारत के मुसलमाँ का न पूछो हाल ज़ार हैं बड़े मजबूरो–बेकस कसमपुर्सी के शिकार मरहबा तनहाई मेरी आज रौशन हो गई सुब्ह का पैग़ाम लेकर आई शामे इन्तज़ार क़ौमी एकजेहती का नारा किस तरह हो कामयाब बह रहा है जबकि चारों सिम्त बहरे इन्तशार क़ौम से इतना ही मतलब रहबराने क़ौम को चाहते हैं गुल्सिताँ पर अपना अपना एक़तेदार जिस्म का साया भी मुझको अजनबी दिखलाई दे राज़ी रोटी छ्‍िन गई है छ्‍िन गया है रोज़गार कौन है जिसने मेरी सारी मसर्रत छीन ली कौन है जो दिल को रखता है हमेशा बेक़रार जिन्दगी के बाग़ में क्या मुस्कराएं गे गुलाब पाँव से लिपटी है मेरे गर्दिशे लैलो नहार मैं तेरा बन्दा हूँ मुझ पर रहम कर परवर दिगार अपने अनवर को न करना हश्र में रुसवा व ख्वार...

नात शरीफ़ ़़़

– नात शरीफ़ – निगाह हक़ से वाबस्ता है मैखाना मुहम्मद का जो दीवाना खुदा का है वो दीवाना मुहम्मद का जिसे जन्नत से तश्बीह देना ग़ैर मुमकिन है मदीने की हैं वो गलियाँ वो काशाना मुहम्मद का रहे गा हश्र तक वो बेनेयाज़ कौसरो–ज़मज़म अज़ल से पी के आया है जो पैमाना मुहम्मद का जिसे देखा वो बीमारे मुहब्बत हो गया उनका बेहम्दुल्लाह अन्दाज़े तैबाना मुहम्मद का फ़क़ीरों को भी मिलती है शहिन्शाही यहाँ सफ़वी ये वो दरबार है दरबारे शाहाना मुहम्मद का (मौरखा 19 दिसम्बर 1958)...

सैयाद भी चमन में ़़़

– ग़ज़ल – सैयाद भी चमन में है और बाग़बाँ भी आज फिकरे बहार भी है ग़मे आशियाँ भी आज सहबाए लुत्फ दोस्त से सरशार थे जो कल दामन कुशाँ है उनसे मए अरग़वाँ भी आज उफ तेरी सादगी की ये रानाई तमाम हैं शर्मसार तुझसे महो कहकशाँ भी आज शरहे जमाले यार किसी से न हो सकी जुम्बिश आ के रह गये कौनो मकाँ भी आज सफवी ये इन्क़लाबे ज़माना का है असर मुँह फेरते हैं मुझसे मेरे मेह्रबाँ भी आज (नवम्बर 1960)...

ज़ुल्म ढाते हैं वो ़़़

– ग़ज़ल – ज़ुल्म ढाते हैं वो आसमाँ की तरह हम तड़पते हैं एक बेज़बाँ की तरह किस से अब शिकवए बेवफाई करें पेश आते हैं वो मेह्रबाँ की तरह उनकी चश्मे करम हो गई ग़ैर पर हम तड़पते रहे नीम जाँ की तरह वो बबातिन तो कुछ मेह्रबाँ हैं मगर उनकी नज़रें हैं ना मेह्रबाँ की तरह साथ सफ़वी के मैखानए इश्क़ में शेख भी आए पीरे मोग़ाँ की तरह (9 जनवरी 1961)...