कहें और क्या बस ़़़

– ग़ज़ल – कहें और क्या बस चलो दोस्तो जहाँ भी रहो खुश रहो दोस्तो ज़मीं पर अगर गिर पड़े आसमां तो दरियाओं पर गिर पड़ो दोस्तो किसी और से ये न सुन पाओगे मैं जो कह रहा हूँ सुनो दोस्तो ये चाँद और ये कहकशाँ क्या करुँ किसी और को बख़्श दो दोस्तो ख़ेजाँ ता ख़ेजाँ गर्द है ख़्वाब की बहारों को आवाज़ दो दोस्तो —–...

दोस्तो ठीक है हर ़़़

– ग़ज़ल – दोस्तो ठीक है हर गाम पे अब जंग करो है इसी में बड़ा आराम हमें तंग करो मोम के जिस्म बुलाते हैं जलाने के लिये तुम भी पत्थराए हुए हो तो मेरा संग करो अपनी सूरत मेरी सूरत में न पाओगे अभी और कुछ रोज़ तमन्नाए गुलो-रंग करो ख़ाक को ख़ाक में मिल जाने दो फ़ुरक़त कबतक रूह को रूह से ऐ दोस्त हम आहंग करो ज़ह्र भी साथ न देगा अगर आँसू टपके इस घड़ी मत मरी आँखों को लहू रंग करो ऐसे अल्फ़ाज़ तराशो जो नये हों राही अपने दीवान से पैदा नये फरहंग करो —–...

न आँख लग सकी ़़़

– आहंग – न आँख लग सकी अपनी न आज ग़म रोया फ़ेज़एं भीग गईं चाँद इस क़दर रोया अवध की शाम का अफसाना याद आता है दयारे शौक़ का वीराना याद आता है मजाज़ नाम का दीवाना याद आता है कि आज सूरते-शहनाज़ व लालारुख तनहा किस की याद में आहंग पढ़ रही हो तुम तुम्हें भी आज ग़मे दिल ने दश्ते वहशत में बुला लिया है कि चाहत किसी की याद करो वो मैकदे में गया क्यों यहाँ न क्यों आया तुम आज वहशतो-हसरत किसी की याद करो ओफ़क़ की ओट से वह भी ये देखता होगा कि उसके बाद शबिस्ताँ पे क्या गुज़रती है क़दम क़दम दिले-याराँ पे क्या गुज़रती है जमाले-शह्रे-निगाराँ पे क्या गुज़रती है इरादा है कि चमन के शगुफ़्ता फूलों में अगर मुझे भी बहारों ने वहशतें बख़्शीं फलक के चाँद सितारों ने वहशतें बख़्शीं तो मैं भी फेर के हँसते हुए गुलों से नज़र जो हो सका तो कोई रंग छोड़ जाऊँगा तुम्हारे वास्ते ’’आहंग’’ छोड़ जाऊँगा —–...

जाने कैसा खुमार ़़़

– ग़ज़ल – जाने कैसा खुमार रहता है दिल मेरा बेक़रार रहता है जिन्दगी अपने ढंग से जीता हूँ दिल पे कब अख्तियार रहता है साथ साया भी छोड़ देता है कौन गर्दिश में यार रहता है जिसको मैं फूल समझ लेता हूँ आगे चल कर वो खार रहता है कल निकाला था जिसको पस्ती से मेरे सर पर सवार रहता है लाख बचता फिरुँ मगर ऐ न्याज़ दिल ग़मों का शिकार रहता है...

अम्न की जब हम ़़़

– ग़ज़ल – अम्न की जब हम जोत जगाने लगते हैं अम्न के दुश्मन शोर मचाने लगते हैं अम्न का जब तामीर नशेमन होता है ज़ुल्म के बादल बम बरसाने लगते हैं बाज़ आओ शाख़ों से कलियां मत तोड़ो फूल से ही गुलज़ार सुहाने लगते हैं तस्वीर जला के बाप की बेटा ये बोला घर में ये आसार पुराने लगते हैं देर नहीं लगती है इज़्ज़त जाने में इसे बनाते बड़े ज़माने लगते हैं देख के मेरे दुश्मन मेरी खुशियों को दीवारों से सर टकराने लगते हैं वक़्त हमें ले आया देखो कहाँ न्याज़ अपने जितने थे बेगाने लगते हैं...

एहसास न मर जाये ़़़

– ग़ज़ल – एहसास न मर जाये कहीं क़ल्बो जिगर में है रूह भी दरकार बहुत इल्मो हुनर में बे खौफो ख़तर होके निकलना नहीं अच्छा शीशे का बदन लेके चटानों के नगर में एक पल में बदल देती है इन्सान की नीयत तासीर हुआ करती है कुछ ऐसी नज़र में पर्दे में ही हो सकती है अस्मत की हिफ़ाज़त बे पर्दा न लुट जाये कहीं राह गुज़र में आसान नहीं होती है ये राहे मुहब्बत रहज़न भी मिला करते हैं उल्फ़त की डगर में गुलशन में न्याज़ अपना क़दम रखना संभल के काँटे भी हुआ करते हैं फूलों के शजर में...