पीर उर की कण्ठ में ़़़

– गीत – पीर उर की कण्ठ में आ राग कैसे बन गई है पीर उर की कण्ठ में —– यह वहीं राकेश विरहिन ताप जो बढ़ कर बढ़ाता सिन्धु क्यों इसके चरण पर झूम श्रद्धान्जलि चढ़ाता आह इसकी शीतता अनुराग कैसे बन गई है पीर उर की कण्ठ में —– प्रिय वियोग विदग्ध रंगिनि आत्म विस्मृति ढो रही है पीर को उर में समेटे आज सन्ध्या सो रही है वेदना इसकी अखण्ड सुहाग कैसे बन गई है पीर उर की कण्ठ में —– वही जो मानव हृदय में चिर पिपासा बीज बोए तृप्ति की आशा लिये तड़पन अपरिमित जो संजोये रागिनी करुणा प्रपूरित फाग कैसे बन गई है पीर उर की कण्ठ में —– ठोकरें खा कर जगत की प्यार जिसका पल न पाया जो कि झंझा में गिरा पर दीनहीन संभल न पाया वह पलायन वृत्ति बोल विराग कैसे बन गई है पीर उर की कण्ठ में —–                         ...

देवि वर दे ़़़

– गीत – देवि वर दे बढ़ सकूँ मैं श्रीचरण में स्थान पाऊँ देवि वर दे —– देखता हूँ अमल अनुपम भाव का गुम्फन सुहाना पा सुरभिमय सुमन डाली समुदमातः मुस्कुराना आ गया हूँ द्वार तक पर शिथिल हूँ क्या लौट जाऊँ देवि वर दे —– लख प्रवाहित धार रस की शुष्क मानस तिलमिलाता अर्चना के सुमन धूमिल पग स्वयं ही ठमक जाता रुक विवशते उग्र मत हो भगवती से पूछ आऊँ देवि वर दे —– देवि बेमांगी दया से किसी को कवि गुरु बनाया सुन विरुद् तेरा पुजारी दूर से कुछ फूल लाया जा करे स्वीकार तो मैं भी सफल जीवन बनाऊँ देवि वर दे —–...

जो रोजे हश्र लैला ़़़

– ग़ज़ल – जो रोज़े-हश्र लैला परदए मोहमिल से निकले गी यक़ीं है आरजूए-कैस उस दिन दिल से निकले गी तमन्ना तीग़ कातिल की रगे बिस्मिल से निकले गी तमन्नाए रगे बिस्मिल दिले कातिल से निकले गी न देखो मुस्कुरा कर ऐ तबीबो राह लो अपनी खलिश है उनके ग़म की ये ज़रा मुश्किल से निकले गी अगर महफिल निकाला अह्ले महफिल ने जो ’राशिद’ का यक़ीनन सारी रौनक़ साथ ही महफिल से निकले गी...

बच्चे होनहार हो गये ़़़

– ग़ज़ल – बच्चे होनहार हो गये रौनक़े बहार हो गये फ़ासला था जिनसे उम्र भर वो गले का हार हो गये गुल बरस रहे हैं हमपे यूँ जैसे हम मज़ार हो गये हश्र का यक़ीन हो गया लोग बेशुमार हो गये ठोकरें जब अपनों से मिलीं ग़ैर मेरे यार हो गये आज हर तरफ ख़ोलूसो-मेह्र नज़रे-इन्तशार हो गये अब तो अपना ज़ुल्म रोकिये हम भी होशियार हो गये राशिद आज अपने शह्र में राह का ग़ुबार हो गये...

ऐशो इशरत में ़़़

– ग़ज़ल – ऐशो-इशरत में खो गये हम लोग क्या थे क्या आज हो गये हम लोग मिट रहे हैं नक़ूश माज़ी के इस ज़माने से लो गये हम लोग उम्र भर जागते रहे लेकिन वक़्त आया तो सो गये हम लोग क्या उगे फस्ल एकता की यहाँ बीज नफ़रत के बो गये हम लोग बे सबब बादबाँ का क्या शिकवा ख़ुद ही कश्ती डुबो गये हम लोग वो भी क्या हौसला था ऐ राशिद सख़्त दिल में समो गये हम लोग...

मेरे अफ़कार का सौदा ़़़

– ग़ज़ल – मेरे अफ़कार का सौदा सरे बाज़ार हुआ एक ऐसा भी तमाशा सरे बाज़ार हुआ आज फिर ख़ैर नहीं अह्ले जोनूँ की शायद आज फिर हुस्न का चर्चा सरे बाज़ार हुआ कोई असमत का ख़रीदार कोई सौदागर मुझसे मत पूछ कि क्या क्या सरे बाज़ार हुआ हुस्न ने ख़ुद ही नज़र अपनी उठाई होगी इश्क़ बेकार ही रुसवा सरे बाज़ार हुआ ख़ुद ही बीमार हैं और ख़ुद ही मसीहा भी हैं ये भी एक तर्जे मदावा सरे बाज़ार हुआ आ गया काम तेरे तेरा जोनूँ ऐ राशिद कोई तुझसे भी शनासा सरे बाज़ार हुआ...