by Nazar | Aug 15, 2015 | Baledeen Besahara
– बिरह गीत – पियवा बसेला देहरादून दरद दूने दून होले ननदी रहिया जाहिला दूनो जून दरद दूने दून होले ननदी पियवा बसेला देहरादून ….. देहिं झंउसाइ देले चान क चननियां बड़ा नींक लागे मोहे कारी रे रइनियां बोलिया कोइलिया करे खून दरद दूने दून होले ननदी पियवा बसेला देहरादून ….. गरमीं बेसरमीं करेजवा कंपावे सरदी बेदरदी अगिनि लहकावे बरखा क पानी लागे नूंन दरद दूने दून होले ननदी पियवा बसेला देहरादून ….. अमवा मोजरि गइलें महुआ कुंवाइल ना जानी काहें मदन बउराइल टुप-टुप चूवे रसबून दरद दूने दून होले ननदी पियवा बसेला देहरादून ….. बनिके पहार हार गरवा दबावे कनवा पकरि झुमका झपिलावे कंगना गारी देला चून-चून दरद दूने दून होले ननदी पियवा बसेला देहरादून ….. आंखि पथराइ गइल देखली न पाती वइसे जरीला जइसे तेल बिनु बाती लागल जवनिया में घून दरद दूने दून होले ननदी पियवा बसेला देहरादून ….. नेहियां सनेहिया क कइसे भुलाई बांस के कइन लेखा देलं अलगाई बालेदीन बिनुं जग सून दरद दूने दून होले ननदी पियवा बसेला देहरादून ….....
by Nazar | Aug 15, 2015 | Baledeen Besahara
कविता देखते देखते लगल कि आपन गांव षहर क बाप हो गइल मंगरु कहलै हम ना जनली इ कुल अपनें आप हो गइल अइसन हवा चलल पच्छूं से बदल गइल कुल चाल ब्यूटी पार्लर खुलल जहां लइकी कटवावें बाल बाप करें मजदूरी बेटवा घूमे रोज बजार माइ के ना मिले दवाइ मेहरी पिये अनार बाप के गोड़ ना लागे बेटा ई कइसन अभिषाप हो गइल मंगरु कहलै हम ना….. एक कोखी क जनमल भाई करेल मारा-मारी अगनां में डड़वार डरावे झंखैं बाप मतारी एक लोटा पानी मंगले दूनो जालैं झपिलाई राम कृश्ण औ सरवन क कुल कथा गइल बिसराई घर के अन्दर के रिष्ता फुटही ढोलक पर थाप हो गइल मंगरु कहलै हम ना….. गुल्ली डंडा, चिकई, हाकी, ओल्हा पाती खेल गिरगिट जइसन किरकिट आके कइदिहलै कुल फेल कजरी, फगुआ चइता नकटा खेमटा गइल हेराई भोरहरिया में भजन के संग जंतसार न कहीं सुनाई माटी के एइ गीतन पर अब सबी लालीपप हो गइल मंगरु कहलै हम ना….. बढ़ल बेमारी मोबाइल क सबके कइलस पस्त रधिया, बुधिया, सगिया, सुनरी पाके भइलैं मस्त घास करत क रहरी में बतिआवेले सुरसतिया चउबिस घंटा कान सटवले घूमेला रमपतिया पढ़े वाले लइकन के मुंह से हाय हेल्लो क जाप हो गइल मंगरु कहलै हम ना….. बाबू जी अब डेड हो गइलैं माई भइलीं मम्मा डब्लू बब्लू टी0बी0 आगे नाचे झम्मक झम्मा इ कुल हाल देख के लागे गांव रसातल जाई सभे बतावा, तब कइसन इतिहास पढ़ावल जाई बालेदीन ओह दिन सब सोची जानबूझ के पाप हो गइल मंगरु कहलै हम ना….....
by Nazar | Aug 15, 2015 | Dwij Chhotkun Shukl
– चौताल – एक ठाढ़ि विरिछ तर नारी विरोग की मारी कि तोर सास ससुर रिसियाने घर से दीन निकारी कि सैंया दूर देशवा में छाये याकि काम अनल तन सारी विरोग की मारी —– हे सखि सास ननद हैं मैं तो दिनन की वारी बिन पिय कौन हरत दुख तनका मोहि छोड़ि विदेश सिधारी विरोग की मारी —– तब तौ रहयों में वारी लरिकवा, अब तो जुवा हमारी अंग अनग सतावन लागे हों दोऊ जोवन मारे कटारी विरोग की मारी —– सुनो सयानी अन्तर जानी पियवा सुरति बिसारी द्विज छोटकुन पिय वेगि मिलावत मोरि हिय की तपनि निवारी विरोग की मारी —– ––– (100 वर्ष पूर्व के रचनाकार हैं, अधिक जानकारी उपलब्ध नहीं...
by Nazar | Aug 15, 2015 | Kaushal Mishra Vats
– प्रधान चरित्र – हमरे गउवाँ कै पढ़ा लिखा सज्जन इन्सान कहावै लैं अबकी चुनाव में जीति गयन एनहू परधान कहावै लैं एनहू परधान कहावै लैं —– गउवाँ में घूमै सुबह शाम झाँकै घुमि घुमि सबकै पड़ोह केकरे घर में बा काव होत लै लेबै सबकै पता टोह चुगुली कइले में मजल खूब ई गाँवां भर के जाहिर है मेहरी भतार कइसे लड़ि हैं यह कमवा में ई माहिर हैं लबडत्री दहिनी कुछ झूठ फूस एक जन के आय पढ़ावै लैं एनहू परधान कहावै लैं —– मोरि इन्द्रा मइया अमर रहैं जे पुरखन कै यादगार किहिन दुख टरै भले न जनता कै परधानन कै दुख टारि दिहिन बेचवाय के लरिकन कै गेहूँ लै लेय वजीफा लरिकन कै बैंके पर करै दलाली नित पेंशन लै ले सब विधवन कै थाने पर इनकै पहुँच बाय सबकै रिपोर्ट लिखवावै लैं एनहू परधान कहावै लैं —– केहु चाय सोपारी देय अगर तौ साथे ओकरे रहै रोज घरवा में चाहै आगि लगै मेहरी लरिका कै नहीं खोज भुईं जेतनी खाली गउवाँ में दिन रात लगाये ओहपर घात सिकरेटरी जोड़ुवां भाई हैं लेखपाल हयन सग नातबात गउवाँ में जेतना जी०एस० बा कौशल पट्टा करवावै लैं एनहू परधान कहावै लैं —–...
by Nazar | Aug 15, 2015 | Kaushal Mishra Vats
– सारी – बइठे जब मोटर गाड़ी में तब देखे अचरज नारी का बस में घुसते ही साहब एक मार ठोकर एक नारी का वह गिरी लड़खड़ा कर बस में लगा शीशा सर में गाड़ी का खूनों की धारा बह निकली सारा आँचल भीगा साड़ी का अधमरी गिरी वह पड़ी रही अब हाल कहीं का नारी का सारी जनता है फेंक रही फौव्वारा उन पर गाड़ी का साहब सोचे अपने मन में भगवान विपति भई नारी का चोटन पर झट से लगा दिये मरहम निकाल कर सारी का सारी में भारी करामात दुख दूर हुआ बेचारी का वह बोली कोई बात नहीं इसमें है चूक सवारी का कौशल सोचै अपने मन में अब करिहैं चोट बीमारी का हमहू चलि के केहू साहब से लै आइब मरहम सारी का।...