उपजै एक कोख ़़़

– रक्षा बन्धन – उपजै एक कोख सहोदर होई एक आपन और एक थाती पराई यह सावन पूनम की तिथि को नित याद करै भगिनी अरु भाई जइसे कौशल दस शीश भये अरु द्रोपदी चीर बढ़ाये कन्हाई यह प्रीत पुनीत कै साखी है राखी भाई के लिये बहिनी कै दोहाई एक ताग बिना अनुराग लिये घर त्यागि पिया कै रहैं सब धाई भोखै चलना कोखै ललना झोखै में लिये चिनिया कै मिठाई कुछ आस लिये अभिलाष लिये मइया से चलीं नेगवा कुछ लाईं देखतै कौशल धंसि जाय धरा अबके अइसै बहिनी अरु भाई ।...

मेरे दिल की किताब ़़़

           *** ग़ज़ल *** मेरे दिल की किताब हो जाना, सारे खत का जवाब हो जाना, मन का मौसम मेरा महक जाये, मुझसे मिलना गुलाब हो जाना, तुम ही पहला गुनाह होना और, पहला पहला शबाब हो जाना, मेरे मैकश की प्यास की खातिर, मेरी आँखों शराब हो जाना, जब भी आएंगे वस्ल के लम्हे, शब तू मेरा हिज़ाब हो जाना              ...

तुम दूर रहे, तुम पास रहे ़़़़़

– गीत – तुम दूर रहे, या पास रहे, तुम प्रेम का एक, एहसास रहे, इस बहती जीवनधारा में, तुम जीने की बस आस रहे, तुम सहरा में जल का आभास, तुम सागर में भी बढ़ती प्यास, मैं तेरे दम से जिन्दा हूँ, तुम धड़कन हो तुम मेरी साँस, इस सूखी प्यासी धरती पर, तुम तो रिमझिम बरसात रहे, तुम दूर रहे, तुम पास रहे …. तुम चाँद की शीतल छाया हो, तुम प्रेम की तपती काया हो, यूँ बाँध लिया मन को मेरे, तुम प्रकृति की कोई माया हो, जिन क्षणों में मेरे साथ रहे, वो पल मेरे मधुमास रहे, तुम दूर रहे, तुम पास रहे ……. तुम सावन की रिमझिम रतिया, तुम फागुन के हो रंग रसिया, कहती हूँ मन से यही बतिया तुम मन में बसे हो मन बसिया, जब तुमको पुकारा है मैंने, तुम हर पल मेरे साथ रहे, तुम दूर रहे, तुम पास रहे ……              ...

गीत तुम भी लिखो ़़़़़

– गीत – कोरे मन पर प्रिये, नेह के पावनी गीत तुम भी लिखो, गीत हम भी लिखें, हर इक शब्द में, गुनगुनाती हुई प्रीत तुम भी लिखो, प्रीत हम भी लिखें गीत तुम भी लिखो . . . . . पायलों की छनक, चूड़ियों की खनक, मन की सोयी उमंगें जगाती रहीं, रात तारों ने आ कर सताया मुझे, चांदनी चाँद की भी जलाती रही, दिल जो माने सही, प्रेम की इक नई रीत तुम भी लिखो, रीत हम भी लिखें गीत तुम भी लिखो . . . . . तुमने जो छू लिया, हो गयी बावरी, जब अधर पर धरा, बांसुरी हो गयी, तान चाहत की जब, तुमने छेड़ी प्रिय, मैं तेरी हाँ तेरी हाँ तेरी हो गयी, दिल के इकरार को, प्रेम में हार को, जीत तुम भी लिखो, जीत हम भी लिखें गीत तुम भी लिखो . . . . . मैं नदी जो बनूँ , तुम किनारा बनो, साथ इक दूजे का, हम तजें न कभी, हर लहर प्रेम की, गीत गाती रहे, वेदना से भरे, सुर सजें न कभी, अपनी  हर आस को, अपनी हर प्यास को, मीत  तुम भी लिखो, मीत हम भी लिखें गीत तुम भी लिखो . . . . ....

कोई नहीं होता ़़़

–  कविता – कोई नही होता, दिल के करीब, जब, पैसा नही होता, चार दिन रखने पर, भूखा मजनू भी, लैला को भूल, रोटी रोटी जपता है, और, अरब के सहरा में, ढूंढता है, भूखमरी का हल, फिर, करता पहल, सोचता है, सुन्दर तन में, बैठी है, सुन्दर आत्मा।...