हो गया जो दिल दिवाना ़़़

– ग़ज़ल – हो गया जो दिल दिवाना क्या करुँगी बिन तेरे मौसम सुहाना क्या करुँगी जब इशारों में ही बातें हो गई हैं पढ़ के अब रंगीं फसाना क्या करुँगी अनगिनत सपने सजाये बांकपन ने अब अगर रूठे ज़माना क्या करुँगी तू अगर माने न माने याद है  सब वो तेरा आँखें चुराना क्या करुँगी खुद पे मुझको है भरोसा देख लेना धड़कनों के साथ गाना क्या करुँगी पूछती हैं ये बहारें ये फेज़ाएं थक गई करके बहाना क्या करुँगी आस्था की लेखनी सर चढ़ के बोले झूट की ताली बजाना क्या करुँगी...

आदमी बेकार होता ़़़

– ग़ज़ल – आदमी बेकार होता जा रहा राह का अख़बार होता जा रहा नफ़रतें लायीं हैं परदेसी हवा मतलबी संसार होता जा रहा जल रहा इंसान अब इंसान से जुल्म का अंगार होता जा रहा झूठ पसरा है ज़हा में इस तरह सच से ही इनकार होता जा रहा कामनायें बढ रही है जीस्त में फ़िक्र पर अधिकार होता जा रहा देखता तक्सीम होते देश को दूर अब घर बार होता जा रहा...

जिसे भेंट श्रद्धा ़़़

                ग़ज़ल जिसे भेंट श्रद्धा सुमन कर रहा था वही देश पूरा हवन कर रहा था मैं जिसके लिये ला रहा था उजाला वही घोर तम का सृजन कर रहा था बुलाती जिसे गाँव की मुशिकलें थीं वो दिल्ली में बैठा भजन कर रहा था सदा डाह रखता ज़माने से जो था ज़माना उसी को नमन कर रहा था बदलने चला था जो बिगड़े चलन को वही सभय़ता आचमन कर रहा था...

व्यथाओं से लेकर ़़़

               – ग़ज़ल – व्यथाओं से लेकर विकल लिख रही हूँ मैं जीवन के बदले गजल लिख रही हूं सुना है जमीं आसमॉ है सभी का इसी हक पे करके अमल लिख रही हूं समंदर में सरिता समाती  है हरदम ठहर के मैं खिलते कमल लिख रही हूं हवाओं का रुख मोड़ते हो सुना है मैं हूं साथ उसकी पहल लिख रही हूं बचालूं मैं शिव जैसे सबको गरल से यही सोचकर दरअसल लिख रही हूँ...

बचा है एक ही पत्ता ़़़

– गजल – बचा है एक ही पत्ता बहार लाने को बड़ी बेताब है आँधी उसे गिराने को हटाके राह से पत्थर लहूलुहान हूँ मैं मगर है फिक्र मिले रास्ता जमाने को चली भी आए है मंजिल मेरे दरीचे पे मेरी खुद्दारियॉ जिद पे हैं आजमाने को उतर के सीढियॉं गिनती रही पहाड़ों को मिला न वक्त समन्दर से कुछ बताने को वे बादलों से बहारों की बात करते हैं मैं परेशान झुलसती फसल दिखाने को...