by Nazar | Aug 15, 2015 | Dr. Shyam Srivastav
झरती हुई चांदनी झरती हुई चांदनी में मन डूबा डूबा लगता है। चेहरे के भीतर का चेहरा ऊबा ऊबा सा लगता है। खुशबू खुशबू हो जाते थे सिर्फ करीब गुजरने से। उस गुलशन का पत्ता पत्ता जहर में डूबा लगता है। अब उम्मीद नहीं लगती है कुछ भी यहां उजाले की। हर घर एक अंधेरी तह में बड़ा अजूबा लगता है। बेमानी उपदेश हो चुके शब्द चलन के बाहर है। जाने किस फितरत में डूबा सूबा सूबा लगता है।।...
by Nazar | Aug 15, 2015 | Dr. Shyam Srivastav
बहुत दिनों के बाद अपने आँगन ने पुचकारा बहुत दिनों के बाद। घर का जोगी सिद्ध बनाया बहुत दिनों के बाद।। इतना भार प्यार का, लघु मन पर कैसे झेलूँ। पहरेदार निगाहों से बचकर कैसे खेलूँ।। अवसर खुला दिया है अबकी बहुत दिनों के बाद। घर का जोगी सिद्ध बनाया बहुत दिनों के बाद।। इतना सब कुछ दिया आपने बिन झोली फैलाये। यह भटका यायावर उसको कैसे धरे उठाए। प्यासे मन की भरी गगरिया बहुत दिनों के बाद। घर का जोगी सिद्ध बनाया बहुत दिनों के बाद।। इनके उनके सबके दिल के द्वार खुले ऐसे। पूरब-पश्चिम, उत्तर-दक्खिन एक हुए जैसे।। पुरवैया का लगा झकोरा बहुत दिनों के बाद। थपकी देकर पास सुलाया बहुत दिनों के बाद।। माँ जैसा आँचल फैलाया बहुत दिनों के बाद। घर का जोगी सिद्ध बनाया बहुत दिनों के बाद।।...
by Nazar | Aug 15, 2015 | Dr. Shyam Srivastav
मौसम की मार चैड़ा-चैड़ा पाट नदी का गहरी-गहरी धार। सब उजड़े-उजड़े रूखे हैं, बे मौसम की मार।। गुमसुम-गुमसुम से पत्थर हैं घाट किनारे के। बहुत दिनों से नहीं पछीटे कपड़े लादी के ।। सियोराम की नहीं सुनाई देती कहीं पुकार। दूर-दूर तक तट सूने हैं, बे मौसम की मार।। नहीं बालते मेंढक, मछली नहीं उछलती है। सूरज की किरणें अब जल में जाल न बुनतीं हैं। बगुलों और टिटहरी के दल कबके हुए फरार। भुख गई ले उड़ा यहाँ से, बे मौसम की मार।। सीपी, शंख, रेत से खाली नदिया की झोली। विधवा जैसी माँग, नहीं सिंदूर, नहीं रोली।। ये नि भी कैसे आए हैं, क्रूर काल की मार। सब उजड़े-उजड़े रूखे हैं, बे मौसम की मार।।...
by Nazar | Aug 15, 2015 | Dr. Shyam Srivastav
रेत बंधे पानी हैं जीवन रस क्या बचता, रेत बंधे पानी हैं। लहरें हैं न हलचल है, कोई न रवानी है। जीवन रस क्या बचता, रेत बंधे पानी हैं।। भीगना न सूखना खोखली हंसी हंसना। कदम कदम बालू के दल-दल गहरे धंसना। कागजी सलाखों में बंद हम कहानी हैं जीवन रस क्या बचता, रेत बंधे पानी हैं।। थोड़े से भीगे तो, सीपी शंख उग आये। बगुलों की आँखों में, चमक बन उभर आये।। कुछ दिन बरसात फिर तपन की निशानी हैं। जीवन रस क्या बचता, रेत बंधे पानी हैं।। आदमी नहीं हैं तो, पत्थर ही ढूंढ़ लिए। मन को समझाने के, यत्न बहुत खोज लिए।। पुरखों को पंद्रह दिन, शेष गुमनामी हैं।। जीवन रस क्या बचता, रेत बंधे पानी हैं।।...
by Nazar | Aug 15, 2015 | Dr. Shyam Srivastav
महुए की गंध फिर महकी धरती में महुए की गंध। समा गये बांहों में शरमीले छंद।। चमक-चमक जाती है ऋण-धन की चचंलता। बलखाती अल्हड़ता सावन सी श्यामलता।। परस-परस जाते हैं गीले मन को नयन। दूर खड़े हंसते रह जाते सब बंधन।। हो गए मिठास भरे सारे छल छंद। समा गये बांहों में शरमीले छंद।। झन्नाहट अंग-अंग छू गई सितार। सिहरन में गुणा भाग जैसा विस्तार।। कोष्ठक सब टूट गये सरल हुई भिन्ना। साधारण समीकरण हो गया अभिन्ना।। मौन मधुर स्वीकृति अब मन का अनुबंध। समा गये बांहों में शरमीले छंद।। बोल-बोल झरी एक दूधिया फुहार। तन मन में व्याप गई मीठी झंकार।। रोम-रोम रंग हुआ साँस हुई तान। आंखों ही आंखों में फूटी मुस्कान।। अंतरतर सरस भाव उठे मंद मंद। समा गये बांहों में शरमीले छंद।।...