by Nazar | Aug 9, 2015 | Alladh Bikaneri
तुम्हीं हो भाषण, तुम्हीं हो ताली दया करो हे दयालु नेता तुम्हीं हो बैंगन, तुम्हीं हो थाली दया करो हे दयालु नेता तुम्हीं पुलिस हो, तुम्हीं हो डाकू तुम्हीं हो ख़ंजर, तुम्हीं हो चाकू तुम्हीं हो गोली, तुम्हीं दुनाली दया करो हे दयालु नेता तुम्हीं हो इंजन, तुम्हीं हो गाड़ी तुम्हीं अगाड़ी, तुम्हीं पिछाड़ी तुम्हीं हो ‘बोगी’ की ‘बर्थ’ खाली दया करो हे दयालु नेता तुम्हीं हो चम्मच, तुम्हीं हो चीनी तुम्हीं ने होठों से चाय छीनी पिला दो हमको ज़हर की प्याली दया करो हे दयालु नेता तुम्हीं ललितपुर, तुम्हीं हो झाँसी तुम्हीं हो पलवल, तुम्हीं हो हाँसी तुम्हीं हो कुल्लू, तुम्हीं मनाली दया करो हे दयालु नेता तुम्हीं बाढ़ हो, तुम्हीं हो सूखा तुम्हीं हो हलधर, तुम्हीं बिजूका तुम्हीं हो ट्रैक्टर, तुम्हीं हो ट्राली दया करो हे दयालु नेता तुम्हीं दलबदलुओं के हो बप्पा तुम्हीं भजन हो तुम्हीं हो टप्पा सकल भजन-मण्डली बुला ली दया करो हे दयालु नेता पिटे तो तुम हो, उदास हम हैं तुम्हारी दाढ़ी के दास हम हैं कभी रखा ली, कभी मुंड़ा ली दया करो हे दयालु नेता ...
by Nazar | Aug 9, 2015 | Rashid Anwar
– ग़ज़ल – जो रोज़े-हश्र लैला परदए मोहमिल से निकले गी यक़ीं है आरजूए-कैस उस दिन दिल से निकले गी तमन्ना तीग़ कातिल की रगे बिस्मिल से निकले गी तमन्नाए रगे बिस्मिल दिले कातिल से निकले गी न देखो मुस्कुरा कर ऐ तबीबो राह लो अपनी खलिश है उनके ग़म की ये ज़रा मुश्किल से निकले गी अगर महफिल निकाला अह्ले महफिल ने जो ’राशिद’ का यक़ीनन सारी रौनक़ साथ ही महफिल से निकले गी...
by Nazar | Aug 9, 2015 | Rashid Siddiqi
– ग़ज़ल – बच्चे होनहार हो गये रौनक़े बहार हो गये फ़ासला था जिनसे उम्र भर वो गले का हार हो गये गुल बरस रहे हैं हमपे यूँ जैसे हम मज़ार हो गये हश्र का यक़ीन हो गया लोग बेशुमार हो गये ठोकरें जब अपनों से मिलीं ग़ैर मेरे यार हो गये आज हर तरफ ख़ोलूसो-मेह्र नज़रे-इन्तशार हो गये अब तो अपना ज़ुल्म रोकिये हम भी होशियार हो गये राशिद आज अपने शह्र में राह का ग़ुबार हो गये...
by Nazar | Aug 9, 2015 | Rashid Siddiqi
– ग़ज़ल – ऐशो-इशरत में खो गये हम लोग क्या थे क्या आज हो गये हम लोग मिट रहे हैं नक़ूश माज़ी के इस ज़माने से लो गये हम लोग उम्र भर जागते रहे लेकिन वक़्त आया तो सो गये हम लोग क्या उगे फस्ल एकता की यहाँ बीज नफ़रत के बो गये हम लोग बे सबब बादबाँ का क्या शिकवा ख़ुद ही कश्ती डुबो गये हम लोग वो भी क्या हौसला था ऐ राशिद सख़्त दिल में समो गये हम लोग...
by Nazar | Aug 9, 2015 | Rashid Siddiqi
– ग़ज़ल – मेरे अफ़कार का सौदा सरे बाज़ार हुआ एक ऐसा भी तमाशा सरे बाज़ार हुआ आज फिर ख़ैर नहीं अह्ले जोनूँ की शायद आज फिर हुस्न का चर्चा सरे बाज़ार हुआ कोई असमत का ख़रीदार कोई सौदागर मुझसे मत पूछ कि क्या क्या सरे बाज़ार हुआ हुस्न ने ख़ुद ही नज़र अपनी उठाई होगी इश्क़ बेकार ही रुसवा सरे बाज़ार हुआ ख़ुद ही बीमार हैं और ख़ुद ही मसीहा भी हैं ये भी एक तर्जे मदावा सरे बाज़ार हुआ आ गया काम तेरे तेरा जोनूँ ऐ राशिद कोई तुझसे भी शनासा सरे बाज़ार हुआ...